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राजनेताओं के भरोसे न रहें मुसलमान।


 ('जनसंदेश टाइम्‍स' में 27 दिसम्‍बर, 2011 को प्रकाशित)
यह सच है कि इंडोनेशिया के बाद विश्‍व में सबसे ज्‍यादा मुसलमान भारत में रहते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जो स्थिति इंडोनेशिया जैसे पिछड़े देश के मुसलमानों की है, भारत में भी कमोबेश स्थिति वही है। यूँ तो वर्तमान में डॉ0 अब्‍दुल कलाम आजाद से लेकर अजीम प्रेमजी, सानिया मिर्जा, शाहरूख खान और ए.आर. रहमान जैसे कुछ बेहद चमकीले नाम गिनाए जो सकते हैं, जो मुस्लिम वर्ग से ताल्‍लुक रखते हैं, पर यह भी कटु सत्‍य है कि एक आम आदमी के दिमाग में मुस्लिम शब्‍द कौंधते ही जो छवि कौंधती है, वह बहुत अच्‍छी नहीं होती। हैरत की बात यह है कि न तो इस बात के लिए मुसलमान चिंतित नजर आते हैं, न मुस्लिम जमातें और सरकार या राजनैतिक दलों का तो खैर कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता, क्‍योंकि उनका काम ही होता है वोट से मतलब रखना और येन-केन-प्रकारेण जनता का दोहन करना।

ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि मुस्लिमों की इस हालत का जिम्‍मेदार कौन है? क्‍या सिर्फ सरकार और सियासतदाँ? हालाँकि ज्‍यादातर मुस्लिमों की राय यही है, पर सच यह है कि उनकी इस हालत के लिए जिम्‍मेदार हैं खुद मुस्लिम, और उनके दिमाग पर हावी धार्मिक जकड़न। इस दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति को बढ़ाने में बाबरी मस्जिद काँड, उसके बाद देश में हुए हिन्‍दू-मुस्लिम दंगों तथा गुजरात के नरसंहार ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। इन घटनाओं तथा इनकी वजह से देश में पैदा हुए राजनैतिक हालात ने मुस्लिमों में असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है। यही कारण है कि आम मुसलमान के दिमाग में उसके अस्तित्‍व की चिंता हर समय हावी रहती है। ऐसे में उसे उम्‍मीद की किरण सिर्फ और सिर्फ धर्म में दिखाई देती है। यही कारण है कि मुस्लिम समाज में जमात और इस्तिमा जैसी गतिविधियाँ तेज हुई हैं और मदरसों में भीड़ तेजी से बढ़ी है।

हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि मुस्लिमों में सिर्फ कम पढ़े-लिखे युवा और प्रौढ़ ही नहीं, शिक्षित वर्ग का एक बहुत बड़ा समूह भी जमात से जुड़ रहा है। जमात एक तरह की स्‍वयंसेवा है, जिसमें प्रत्‍येक शहर में स्थित मरकज़ (धार्मिक संगठन) के नेतृत्‍व में मुस्लिम व्‍यक्ति अपने खर्चे पर देश के किसी स्‍थान पर जाते हैं और वहाँ पर एक निश्चित अवधि तक जन-सम्‍पर्क करके स्‍थानीय निवासियों को रोज़ा, नमाज, कुरान से नजदीकी बढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके अलावा धार्मिक सम्‍मेलन के रूप में आयोजित होने वाले इस्तिमा जैसे कार्यक्रम भी हाल के वर्षों में काफी तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। गौरतलब है कि ये गतिविधियाँ यूँ तो मुस्लिमों को संगठित रहने एवं उनमें धार्मिक भावनाओं के प्रसार के लिए आयोजित की जाती हैं, लेकिन खेदजनक यह है कि इनसे मुस्लिमों में धार्मिक जकड़न बढ़ रही है और उनके सामने पहले की तुलना में शिक्षा, आर्थिक और समाजिक स्‍तर पर और ज्‍यादा पिछड़ने का खतरा पैदा हो रहा है।

दुर्भाग्‍यपूर्ण यह भी है कि देश की आबादी में 15 से 20 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी रखने वाले मुस्लिम समाज के पास कोई कायदे का रहनुमा तक नहीं है। ऐसे में वे धार्मिक नेताओं की ओर देखने के लिए मजबूर हो जाते हैं। और जैसी कि धार्मिक नेतृत्‍वकर्ताओं की सोच होती है, वे धार्मिक बातों के बारे में तो हद से ज्‍यादा उत्‍सुक नजर आते हैं, पर दुनियावी दशा के बारे में पूरी तरह से आँखें मूँदे रहते हैं। उन्‍हें लगता है कि अगर मुसलमान पूरी तरह से धार्मिक हो जाएगा, तो उसकी सारी समस्‍याएँ अपने आप समाप्‍त हो जाएँगी। इस एकाँगी सोच के कारण ज्‍यादातर मुस्लिम अरबी को पढ़ लेने की योग्‍यता को ही असली शिक्षा समझने लगते हैं और इबादत का तरीका जान लेने भर को ही सफल जीवन का मूलमंत्र मान बैठते हैं। इसका खामियाजा यह होता है कि आधुनिक शिक्षा के प्रति उनके मन में अरूचि पैदा हो जाती है और वे सामाजिक रूप से ही नहीं आर्थिक स्‍तर पर भी पिछड़ते चले जाते। ऐसे में धीरे-धीरे उन्‍हें लगने लगता है कि देश में मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है और साजिश के तहत उन्‍हें रोजगार से दूर रखा जाता है। आश्‍चर्य का विषय यह है कि अशिक्षित और निचले तबके के लोग ही नहीं शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से सम्‍पन्‍न मुस्लिम भी इस मानसिकता से ग्रस्‍त पाए जाते हैं। इस‍ीलिए वे लोग धार्मिक प्रतीकों का ज्‍यादा से ज्‍यादा इस्‍तेमाल करते हैं, धार्मिक गतिविधियों में ज्‍यादा से ज्‍यादा रूचि लेते हैं और यहाँ तक कि अपने धर्म के समूह के साथ ही रहना और सम्‍पर्क स्‍थापित करना ज्‍यादा पसंद करते हैं। अपने समूह के साथ सुरक्षित रहने की इस भावना के कारण ही शायद वे छोटे परिवार के महत्‍व को समझ नहीं पाते और प्रकारांतर से ठीक-ठाक कमा लेने के बावजूद कष्‍टप्रद स्थितियों में जीवन जीने के लिए मजबूर होते हैं।

ऐसा नहीं है कि मुस्लिम धर्म की संरचना ही रूढि़यों को लेकर हुई हो। यदि मुस्लिम धर्म की स्‍थापना के दौर को ही देखा जाए, तो उस समय अरब की जो सामाजिक स्थितियाँ थीं, उसमें ढ़ेर सारी सामाजिक बुराईयाँ जड़ जमाए हुए थीं। मोहम्‍मद साहब ने एक क्रान्तिकारी चेतना के रूप में उनसे विद्रोह करते हुए प्रगतिशील विचारधारा को जन्‍म दिया था। यही कारण था यह धर्म तेजी से सम्‍पूर्ण विश्‍व में फैला था। लेकिन कालान्‍तर में वैचारिक जागरूकता के अभाव में उसका नियंत्रण कुछ ऐसे लोगों के हाथों में आ गया, जोकि लकीर के फकीर ज्‍यादा थे, वैचारिक चेतना सम्‍पन्‍न कम। यही कारण था कि उन्‍होंने मोहम्‍मद साहब के इल्‍म हासिल करने के लिए अगर तुम्‍हें सात समंदर पार भी जाना हो तो जरूर जाओ जैसे कथन को भी धार्मिक शिक्षा तक ही समेट कर रख दिया। ऐसे में मुस्लिम समाज में धार्मिक जकड़न दिनों दिन बढ़ती चली गयी और आम मुसलमान आधुनिक शिक्षा और प्रकारान्‍तर में विकास से दूर होता चला गया।

गहराई से देखा जाए, तो मुस्लिम धर्म में आपसी सम्‍पर्क की एक सशक्‍त परम्‍परा मौजूद है। पाँच वक्‍त की नमाज़ को अगर छोड़ भी दिया जाए, तो सप्‍ताह में एक दिन होने वाली जुमे की नमाज में प्राय: हर मुस्लिम व्‍यक्ति मस्जिद में इकट्ठा होता है। जुमे की नमाज शुरू होने से पहले मौलवी के द्वारा समूह को खुत्‍बा के रूप में सम्‍बोधित करने की परम्‍परा है। (खुत्‍बे का आशय तकरीर से होता है। अरब में जब इसकी शुरूआत हुई थी, तो इस तरकरीर में सप्‍ताह भर के धर्म से जुड़ी गतिविधियों का जिक्र किया जाता था। लेकिन बाद में यह एक रूढि़ बन गया और उसे एक मुद्रित संदेश के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। जबकि आज के हालात को देखते हुए जरूरत यह है कि इसे वा‍स्‍तविक स्‍वरूप प्रदान करते हुए एक जीवंत तकरीर का रूप दिया जाए और उसके द्वारा मुस्लिमों की धार्मिक चिंताओं के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक दुश्‍वारियों को भी उसमें शामिल किया जाए।) जुमे के अतिरिक्‍त मुस्लिम समाज में मीलाद, कुरानख्‍वानी, जमात और इस्तिमा जैसे आयोजन हैं, जिनमें लगभग सभी मुस्लिम भागीदारी करते हैं। इसलिए इन धार्मिक आयोजनों का उपयोग करके मुस्लिमों में सामाजिक एवं आर्थिक चेतना जगाने का काम आसानी से किया जा सकता है।

आज समाज के जैसे हालात हैं, उससे साफ लगता है कि न तो कोई राजनैतिक दल अथवा कोई सरकार मुसलमानों का भला करना चाहती है। ऐसे में मुसलमानों और विशेषकर मुस्लिम धार्मिक संगठनों को इस विषय पर सोचना होगा। मुस्लिम धार्मिक संगठनों को चाहिए कि वे प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाएँ और मुस्लिमों की धार्मिक चेतना के साथ-साथ उनकी सामाजिक और आर्थिक दशाओं के बारे में भी सोचें और उनकी दुनियावी बेहतरी के लिए भी आगे बढ़ कर आएँ। इससे न सिर्फ मुस्लिमों की सामाजिक और आर्थिक हैसियत में सुधार होगा वरन उनके प्रति दुनियावालों की सोच में भी बदलाव आएगा। और जाहिर सी बात है, इससे आम मुसलमान की नजरों में धार्मिक संगठनों का महत्‍व भी बढ़ेगा, लोग उनसे जुड़ने में ज्‍यादा खुशी का अनुभव करेंगे।

12 comments:

सुज्ञ ने कहा…

बहुत ही सार्थक और वस्तुपरक चिंतन!!
आंतरिक मनोमन्थन और विकास के उपाय होने ही चाहिए। और यह उनकी जिम्मेदारी अधिक है जिनके हाथों में नेतृत्व है।

सुन्दर विश्लेषण के लिए शुभकामनाएँ!!

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

राजनेता लोग जो भी करते हैं वह सत्ता के लिए करते हैं। उससे जनता का भला कम और उनका भला ज़्यादा होता है। जो पार्टियां कांग्रेस नहीं हैं। वे भी इसी तरह की ड्रामेबाज़ी करती रहती हैं।
क्या इन सबके बारे में लिखना ही समय ख़राब करना नहीं है ?
तब तो ताज़ा राजनीतिक हलचल के बारे में लिखना ही बंद हो जाएगा।
दरअस्ल ये राजनेता तभी तक ड्रामेबाज़ी कर रहे हैं जब तक कि जनता ख़ुद अपने परिवार के लिए और अपने आसपास के लिए ठोस काम नहीं करती।
लोग अपने आस पास ठंड से ठिठुरते हुए ग़रीब लोगों को देखते रहते हैं लेकिन वे उन्हें अपने पुराने कपड़े तक नहीं देते। हरेक मध्यमवर्गीय घर में ऐसे कपड़ों का ढेर लगा हुआ है, जिन्हें पहनना बंद किया जा चुका होता है।
संवेदनाहीन समाज का नेतृत्व खुद ब खुद ऐसे ही लोगों के हाथों में चला जाता है। जिन्हें समस्याओं के वास्तविक समाधान से कोई दिलचस्पी नहीं होती। नेता हमारा नुमाइंदा है। हमारा नेता हमारी सामूहिक प्रवृत्ति का प्रतिबिंब और सूचक है। हम अच्छे और गंभीर होंगे तो हमारा नेता भी अच्छा और गंभीर होगा।

ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने ग़रीबों को अपने गले लगाया है और दिल से लगाया है। उनके बारे में और उनके तरीक़े के बारे में कम ही कोई लिखता है।
प्रस्तुत लेख ऐसा ही है। इस लेख पर आपका सादर स्वागत है।

सूफ़ी साधना से आध्यात्मिक उन्नति आसान है Sufi silsila e naqshbandiya
http://vedquran.blogspot.com/2012/01/sufi-silsila-e-naqshbandiya.html

रविकर ने कहा…

शुक्रवार भी आइये, रविकर चर्चाकार |

सुन्दर प्रस्तुति पाइए, बार-बार आभार ||

charchamanch.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

एकदम सही व सार्थक विश्लेषण

रवींद्र ने कहा…

ज़ाकिर भाई

अस्लाम्वालेकुम.

आप जैसी सोच वाले लोग ही इस दुनिया में इस्लाम को ज़िंदा रखे हुए हें.

कुश्वंश ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति ,सार्थक विश्लेषण

Pallavi ने कहा…

बहुत सही एवं सार्थक विश्लेषण ....

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

मैं तो सिर्फ यही कहूंगा कि बजाय मौकापरस्त गिद्ध दृष्ठि नेतावों को दोष देने के मुसलमानों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिए ! तुच्छ निजी स्वार्थों के लिए सार्वजनिक हितों की बलि देना कोई समझदारी वाला काम नहीं ! मेरी यह बात मुसलामानों को भले ही बुरी लगे कि इस देश की राजनीति का अपराधीकरण करने में मुस्लिम वोटरों की एक अहम् भूमिका रही है, लेकिन यह एक कटु सत्य है ! उत्तरप्रदेश में ही माया मुलायम के शुरुआती तारनहार कौने थे ?

मुस्लिम देशों में महिलाओं पर अनेक प्रतिबन्ध है मगर इस देश में तो सबको सामान अधिकार है ! सउदी अरब जैसे कट्टर मुस्लिम देश ने भी महिलाओं को स्वेच्छा से वोट का अधिकार दे दिया है ! मैं पूछना चाहूँगा कि इस देश के मुस्लिम पुरुस कब मुस्लिम महिलाओं को स्वेच्छा से वोट डालने का अधिकार प्रदान करेंगे ? और कब तक ये फतवा राजनीति चलेगी ?

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ पी. सी. गोदियाल जी ‘परचेत‘ जी ! देश का सोना गुप्त गर्भगृहों में रखने के दोष से और ब्याज के रूप में ग़रीबों का ख़ून चूसने के इल्ज़ाम से तो मुसलमान बरी है न ?
चुनावों में पैसा यही अमुसलमान तत्व लगाते हैं और ये अरब में नहीं बल्कि यहीं रहते हैं और ये औरत का भंवरी देवी बना देते हैं।
औरत को बाहर लाने से पहले एक सुरक्षित समाज का निर्माण भी ज़रूरी है और उसके नीति नियम आपके पास हों तो आप दीजिए वर्ना कहीं से आयात ही कर लीजिए।
चुनावों में ये मुद्दे उठते नहीं हैं और जनता त्रस्त इन्हीं बातों से है।
जिनके दिलों में नफ़रत पल रही है, वे आग में घी और डाल रहे हैं।
देश को तबाह करने वाले यही नफ़रतजीवी हैं।

हमारा मानना यह है और आपको बुरा बिल्कुल भी नहीं मानना चाहिए।
साफ़ कहना हमारी ही पहचान है।

ख़ैर प्यारी मां पर एक सुनहरा क़ौल देखिए
रिश्ते बनाना उतना ही आसान है जितना कि ...
मिटटी पर ..- मिटटी से ...- "मिटटी " लिख देना ,,
और रिश्ते निभाना उतना ही कठिन, जितना कि ....
पानी पर ...-पानी से ...- "पानी" लिख पाना !!

http://pyarimaan.blogspot.com/2012/01/blog-post_05.html

veerubhai ने कहा…

जोरदार विश्लेषण ,सार्थक सुझाव और धार्मिक नेतृत्व का सही आवाहन .

कुमार राधारमण ने कहा…

जहां जनता को होश न हो कि वह स्वयं अपना भाग्य तय कर सकती है,उसकी यही नियती है।

 

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