Wednesday, 3 June 2009

बाल कहानी- शर्त मंजूर है

(अल्मोडा, उत्तरांचल से प्रकाशित त्रैमासिक बाल पत्रिका "बाल प्रहरी" ने इस कहानी को आगामी 13 एवं 14 जून को भीमताल, नैनीताल, उत्तरांचल में आयोति बाल साहित्य सम्बंधी गोष्ठी में वर्ष 2008 की सर्वश्रेष्ठ कहानी के पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।)

जैसे ही सरवर के छमाही परीक्षाफल पर उसके अब्बू की नजर पड़ीं, उनका मूड खराब हो गया। सरवर दो विषयों में फेल था। वाकई यह बहुत बड़ी बात थी?और फिर ऐसे में उनका मूड भला क्यों न खराब होता? उनका मन हुआ कि वे छड़ी उठाएं और सरवर को पीटना चालू कर दें। पर खैरियत यह कि सरवर उस समय वहां पर था नहीं, नहीं तो.........
´´मुझे तो पहले से ही इस लड़के के रंग-ढंग सही नहीं दिख रहे थे।´´ उन्होंने सरवर की अम्मी को सम्बोधित कर कहना शुरू किया, ´´जब देखो, तब पेfन्टंग। पेfन्टंग के आगे पढ़ाई-लिखाई सब गोल। आने दो आज लाट साहाब को। मार-मार कर भूत न बना दिया, तो मेरा नाम भी ..............।´´
´´अरे, किसे डांट रहे हो भाई?´´ यह स्वर वर्माजी का था, जो सरवर के अध्यापक थे और उसी समय वहां आ गये थे।
´´आइए वर्माजी, ये देखिए अपने शिष्‍य का कारनामा।´´ उनकी तरफ परीक्षाफल बढाते हुए अब्बू बोले, ´´दो विषयों में फेल हैं लाट साहब!´´
तभी सरवर भी वहां आ गया। लेकिन उसने वहां पर रूकना उचित नहीं समझा और वर्मा सर को नमस्ते करके अंदर कमरे में चला गया।
´´हां, मुझे सब मालूम है।´´ कुर्सी पर बैठते हुए वर्मा जी बोले, ´´मैंने इसके दोस्तों से सारी बात पता की है। और अगर सही मायनों में देखा जाए, तो इसमें आपकी ही ज्यादती है।´´
´´मेरी ज्यादती?´´ सरवर के अब्बू चौंके।
´´हां, क्योंकि आपने उसकी भावनाओं का ठीक ढंग से समझा ही नहीं।´´
´´सो कैसे?´´
´´देखिए, यह तो आप जानते ही हैं कि सरवर बहुत अच्छे चित्र बनाता है। पिछले साल स्कूल की प्रतियोगिता में उसने प्रथम पुरस्कार भी जीता थ्रा।´´
´´हां, वो तो है।´´ कहते हुए उन्हें वह दिन याद आ गया। शाम को आफिस से लौटने पर जब उन्हें वह समाचार मिला था, तो वे बहुत खु हुए थे। लेकिन जब उन्हें यह मालूम चला था कि इसके लिए सरवर ने प्रैfक्टस में कितने घंटे खपाए हैं, तो वे बहुत नाराज हुए थे। इतने से इनाम के लिए इतना कीमती समय बरबाद करने से फायदा? अगर इतनी देर ठीक से पढाई की होती, तो एक पेपर तैयार हो गया होता।
सरवर के अब्बू के चेहरे को पढ़ते हुए वर्मा जी ने बात आगे बढाई, ´´पर आपने उसकी प्रंसा में दो ब्द कहने तो दूर, उसे बुरा-भला कहा। इससे उसकी भावनाएं कुंठित हो गयीं। पहले तो वह सिर्फ खाली समय में चित्र बनाता था, लेकिन जब आपने उसके सम्मान को ठेस पहुंचाई, तो वह चोरी-छुपे
पढने के समय में भी चित्रों को बनाने लगा।
´´
´´लेकिन उसको नहीं करना चाहिए था।´´
´´ऐसा आप इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि आपको बच्चों का स्वभाव नहीं मालूम। बालक का यह स्वभाव होता है कि जिस काम को करने से उसे रोका जाए, वह उसी काम को करता है। ऐसा करके वह दिखाना चाहता है कि आपकी मर्जी के सिवा भी उसका कोई व्यक्तित्‍व है। जैसा कि आपने स्वयं....´´
´´ओह, इसका मतलब है यदि,...?´´
´´हां, यदि आप उसे डांटने-फटकारने के बजाए उसकी सराहना करते और उसे प्यार से समझाते, तो शायद यह दिन कभी न देखना पड़ता। पहले की तरह आज भी वह दोनों क्षेत्रों में अव्वल होता।´´
´´हां, पिछले साल तो वह प्रथम आया ही था।´´ कहते हुए सरवर के अब्बू ने एक लंबी सांस ली।
तभी सरवर चाय लेकर वहां आया और चाय के कपों को मेज पर सजाने लगा। उसका हाथ थाम कर अब्बू बोले, ´´देखो बेटे, जो कुछ हुआ, उसे तुम भूल जाओ। मुझे तुम्हारे चित्र बहुत पसंद हैं। कल ही मैं तुम्हारे लिए चित्रकारी का सामान ला दूंगा। पर एक शर्त है। पहले पढ़ाई, फिर चित्रकारी।´´
´´मुझे आपकी र्त मंजूर है।´´ कहते हुए सरवर खुी से झूम उठा। उसके चेहरे पर खुfयों के अनेक रंग बिखर गये और वह भी एक खूबसूरत चित्र सा नजर आने लगा।

24 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर कहानी. बधाई हो.

रामराम.

Priya said...

sakaratmak soch! achchi kahani hain

गौतम राजरिशी said...

अच्छा अंदाज़ कहने का। एक पुरानी बात को नये परिपेक्ष्य में कहना भाया...
बधाई, सर!

venus kesari said...

कहानी तो अच्छी लगी मगर इसकी प्रस्तुति, भाव और सन्देश व पात्र तक मुझे आपकी पुस्तक विज्ञान कथा की एक कहानी के समान लगी जिसके बालक रेडियो की ऐसी बैट्री बनाना चाहता था जिसे कभी चार्ज न करना पड़े ......
एक ही विषय पर एक ही तरह की दो कहानी ...ऐसा क्यों भई ???

वीनस केसरी

दिगम्बर नासवा said...

सुन्दर तरीके से कही है आपने कहानी............सादे शब्दों में

महामंत्री - तस्लीम said...

वीनस भाई, आपने सही पहचाना। वह कहानी बडों के लिए थी और यह बच्चों के लिए। इसीलिए उसी विषय को अलग अलग ढंग से लिखा गया है। हाँ, इससे इतना तो तय है कि आपने दोनों कहानियां ध्यान से पढी हैं।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

अभिषेक ओझा said...

अच्छी कहानी. बच्चों की भावनाओं को समझना और प्यार से रखना जरूरी है.

shamim uddin said...

dear zakir,

this is again a good story. zakir please provide the dates of your post also.

shamim

Zindagi said...

Good story, Very nice blog

Nirmla Kapila said...

bahut badiya kahani hai kai baar kya ham aksar hi bachon par apni bat jabardasti thhopana chahte hain use samjhe bina unka iterest create kiye bina apki kahani bahut achhi hai badhai

janta ki aawaz said...

dil khush ho gaya ye kahani padh kar .....

cartoonist anurag said...

kahni se aapne jo sandesh diya hai uske liye aapko BAHUT-BAHUT BADHAI....

Rajnish Sharma said...

Zakir Ali"Rajnish" ji....
..namaskaar..!
Shayad aapko yaad hoga... kai saal pahle hum Lucknow/Unnao mein Yuva-Bharat ke sandarbh mein mile the.... aapne apna naam bataya tha... jo ki mera hi naam hai... "Rajnish" ...
.... agar aapko kuchh yaad aaye to mujhse sampark kijiye.. raznice@gmail.com
...
...
Aur haan aap to lekhan me bahut hi maahir hai... aapko fir jaankar bahut achha laga....
... aapka bula-bichhada dost Rajnish K Sharma- lucknow

मोहम्मद कासिम said...

बढीया मुबारक हो-
मेरे ब्लाग पर आपका स्वागत है
http://sim786.blogspot.com/

कृपया अपने अमुल्य सुझाव एवं टिप्पणी दे।

हिमांशु । Himanshu said...

बालमन को समझने की जरूरत है भली प्रकार । कहानी खूबसूरत है ।

sandhyagupta said...

Bahut achchi lagi aapki kahani.Badhai.

शोभना चौरे said...

prerna dayk kahani

sarwat m said...

९०% से भी ज्यादा मां-बाप अपने बच्चे को वो बनाना चाहते है जो उनकी इच्छा है. बच्चे की रूचि किस में है, इससे उनका सरोकार नहीं होता. बच्चे में यदि गायन, अभिनय, संगीत, चित्रकारी के प्राकृतिक गुण हैं तो रहें, बाप ने डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना देखा है तो उसके लिए नादिरशाही फरमान जारी हो जायेगा. उनकी इस इच्छा की बलिवेदी पर यदि बच्चे का एकेडमिक कैरियर बर्बाद होता है तब भी बच्चे को ही फजीहत झेलनी होती है. आप ने जिस कथा का चयन किया है, वह शायद बहुतों की आँखें खोल दे.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

रोचक बाल-कथा के लिए बधाई।

ARUNA said...

bahut hi achi kahani hai Rajnish ji......aapka andaaz kaabiley taareef hai!!

KK Yadav said...

आपका ब्लॉग नित नई पोस्ट/ रचनाओं से सुवासित हो रहा है ..बधाई !!
__________________________________
आयें मेरे "शब्द सृजन की ओर" भी और कुछ कहें भी....

आकांक्षा~Akanksha said...

Bahut sundar kahani.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

haqiqat he/
ab itani lambi aour achhi kahaani par do line ki tippani me nahi de sakata/ isliye janaab, baad me kabhi aapko vistaar se likhne ki ichha he, dekhe ye ichha kab poori hoti he/
badhaai sahit
aapka
Amitabh

रावेंद्रकुमार रवि said...

यूँ ही प्रगति करते रहें!
नए वर्ष पर मधु-मुस्कान खिलानेवाली शुभकामनाएँ!
सही संयुक्ताक्षर "श्रृ" या "शृ"
FONT लिखने के चौबीस ढंग
संपादक : "सरस पायस"