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ब्लॉगिंग का इतिहास लिखा जाने वाला है -रवि रतलामी।

पिछले कुछ दिनों से ब्लॉगिंग में इतनी गंदगी फैल गयी है कि सांस लेना दूभर हो गया है। जहाँ जाइए, वहाँ लोग एक दूसरे को खुला चैलेंज दे रहे हैं, गालियाँ दे रहे हैं। जितनी तू-तड़ाक संसद में नेताओं के बीच नहीं होती होगी, उतनी जूतमपैजार ब्लॉग जगत में हो रही है। और आश्चर्य होता है कि इस आवेश में बह कर धीर गम्भीर लोग उल्टा-सीधा लिखने से स्वयं को रोक नहीं पा रहे हैं।

एक मछली सारे तालाब को कैसे गन्दा करती है, यह आज हमें समझ में आ रहा है। अगर ये मछलियाँ जाहिल गंवार होतीं तो बात समझ में आती। यहाँ तो मछलियाँ भी इतनी हाई प्रोफाइल हैं कि किसी को समझाने की जुर्रत भी नहीं की जा सकती। आश्चर्य का विषय यह है कि पढ़े-लिखे होने के बावजूद लोगों को यह यह बात क्यों नहीं समझ में आती कि आप दूसरे को नीचा दिखाकर कभी खुद को महान नहीं साबित कर सकते।

इस माहौल को देखकर कई दिनों से मेरा मन खिन्न था। तभी कल मेरी नजर अचानक अपनी पिछली पोस्ट “शोध प्रबंधों तक जा पहुंची है ब्लॉगर्स की धमक” की टिप्पणियों पर जा पड़ी। वहाँ पर रवि रतलामी जी का कमेंट देखकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई। उन्होंने उस कमेंट के द्वारा यह सूचना दी है “हाल ही में एक छात्रा का उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय से हिन्दी ब्लॉगिंग पर पीएच.डी. हेतु पंजीयन हुआ है.”

किसी और के लिए यह ख़बर महत्वपूर्ण हो न हो, पर मेरे लिए यह समाचार बहुत मायने रखता है। इसके मायने यह हैं कि जो कुछ आप ब्लॉग पर लिख रहे हैं, अब वह बेकार नहीं रहा। उसे नोटिस लिया जा रहा है। आज नहीं तो कल वह इतिहास का हिस्सा बनने वाला है।

तो भाइयो, (भाइयों को इसलिए सम्बोधित कर रहा हूँ क्योंकि ज्यादा गड़बड़ी वही लोग कर रहे हैं। आशा है बहनें इसका बुरा भी नहीं मानेंगी?) अब भी समय है। आप स्वयं सोच लो और यह तय कर लो कि इतिहास आप को किस रूप में याद रखे?

गूगल की बेवफ़ाई की कोई तो वजह होगी?

रवि रतलामी जी, आशीष खण्डेलवाल जी, पाबला जी, नवीन प्रकाश जी और अन्य तकनीकी विशेषज्ञ कृपया मदद करें।

इस बेवफाई की शुरूआत अगस्त माह में हुई, जब मैंने अपने ब्लॉग के लिए samwaad.com डोमेन खरीदा और फिर अपने सभी ब्लॉगों को अलग-अलग सी नेम बनाकर उन्हें samwaad.com से जोड़ दिया, जो परिवर्तित होकर निम्नानुसार हो गये-
तस्लीम tsaliim.blogspot.com से ts.samwaad.com
साइंस ब्लॉगर्स असो0 sciblogindia.blogspot.com से  sb.samwaad.com
बालमन baal-man.blogspot.com से  bm.samwaad.com
हमराही hamrahee.blogspot.com से  ts.samwaad.com
मेरी दुनिया.. alizakir.blogspot.com से  za.samwaad.com

मेरे सभी ब्लॉग गूगर सर्च इंजन में प्रमुखता से दिखें, इसके लिए मैंने पहले से ही उनके साइटमैप गूगल के वेबमास्टर टूल के जरिए सब्मिट कर रखे थे। लेकिन डोमिन नेम बदलने के बाद उन्हें फिर से सब्मिट करना जरूरी हो गया था। इसके लिए मैंने पहले उन सभी साइट मैप को डिलीट कर दिया और उसके बाद दूसरी आईडी से यही प्रक्रिया दोहरा दी। लेकिन काफी समय के बाद मुझे यह पता चला कि गूगल सर्च में मेरे ब्लॉग नहीं दिख रहे हैं।

मेरे एक मित्र की सलाह है कि आपने चूंकि दूसरी आई डी से दुबारा साइटमैप सब्मिट किये थे, इसलिए यह हो रहा है। उन्होंने सलाह दी है कि इन साइट मैप को एक बार फिर से डिलीट करके एक सप्ताह के बाद पहली वाली आई डी से सब्मिट कर दें। मैंने उनके बताए सुझाव के अनुसार सभी साइट मैप एक बार फिर से डिलीट कर दिये हैं। लेकिन अभी उन्हें किसी भी आईडी से सब्मिट नहीं किया है। इसकी एक वजह मेरी यह आशंका भी है कि अगर फिर से यह प्रक्रिया सफल नहीं हुई तो मैं क्या करूंगा?

इसलिए आप सबसे मेरा निवेदन है कि कृपया इस मुश्किल को हल करने में मेरी मदद करें और बताएँ कि इस दशा में मुझे क्या करना चाहिए? इस सहयोग के लिए मैं आप सबका हृदय से आभारी होऊंगा।
चलते-चलते एक बात और बताना चाहूँगा कि मैंने इसी प्रकार याहू में भी अपने ब्लॉग के साइटमैप सब्मिट किये थे, जो वहाँ पर ठीक ढ़ंग से काम कर रहे हैं।

छ: साल के लड़के के लिए प्रेम पत्र का क्या मतलब है?


पता नहीं यह छोटे पर्दे पर हद से ज्यादा पैर पसार चुके सेक्स का कुप्रभाव है अथवा कार्टून फिल्मों में पसरे रोमान्टिसिज्म का जादू, मैं इसे समझ पाने में पूरी तरह से अस्मर्थ हूँ।

यह कोई कल्पना अथवा गप्प नहीं, एक सत्य एवं आँखों देखी घटना है। आँखों देखी भी क्या सीधे-सीधे शब्दों में कहूँ तो मेरे घर की घटना है और इसे आपके साथ शेयर करने में मुझे कोई झिझक अथवा संकोच नहीं है।

मैं अपने बड़े बेटे अहल की बात कर रहा हूँ। उसकी उम्र है 6 वर्ष और वह वर्तमान में के0जी0 का विद्यार्थी है। यह घटना अभी पिछले सप्ताह की ही है। हुआ यूँ कि वह एक काग़ज़ पर कोई ड्राइंग बना रहा था। अपनी ड्राइंग को पूरी करने के बाद उसने अपनी मम्मी से अन्नपूर्णा शब्द की स्पेलिंग पूछी। अन्नपूर्णा उसके क्लास की ही एक लड़की है और स्कूल की बातों के दौरान घर में अक्सर उसका जिक्र आता रहता था। स्पेलिंग पूछने पर मिसेज़ चौंकीं और उसका कारण पूछा। पहले तो बेटा शर्मा गया, फिर उसने सकुचाते हुए बताया कि हमें अन्नपूर्णा को एक लेटर देना है, इसलिए उसमें उसका नाम लिखना है। मिसेज़ ने कहा ठीक है और उसे स्पेलिंग बता दी।

अपने लेटर का पूरा काम खत्म करने के बाद अहल ने उस काग़ज़ को संभाल कर स्कूल बैग में रख दिया। साथ ही उसने अपनी मम्मी को यह हिदायत भी दी कि आप इसे निकालयेगा नहीं। मिसेज़ ने चुपचाप हामी भर दी। लेकिन उन्हें भी उस लेटर को देखे बिना चैन कहाँ? उन्होंने बाद में चुपके से जब उस लेटर को निकाल कर देखा, तो वे सन्न रह गयीं।

लेटर में एक बड़ा सा दिल बना हुआ था, जिसके आर-पार एक तीर निकला था। दिल के ठीक उपर लिखा हुआ था- "अन्नपूर्ण आई लव यू।"

6 साल के बच्चे के ये भाव देखकर मिसेज़ शॉक्ड रह गयीं। शाम को उन्होंने मुझे सारी बात बतायी। मैंने इस बात को इग्नोर करना ही बेहतर समझा और लड़के से इस बारे में कुछ नहीं कहा। हाँ, अगले दिन की प्रतीक्षा तो थी ही, कि उस लव लेटर का क्या हश्र हुआ? साथ ही मन में एक डर भी था कि कहीं वह स्कूल की टीचर तक न पहुंच जाए और छोटी सी बात का बतंगड़ बन जाए।

अगले दिन जब अहल स्कूल से घर लौट कर आया, तो मिसेज़ ने मौका देखकर उस लव लेटर के बारे में पूछा। उसके बारे में पूछते ही वह बुरा सा मुँह बनाकर बोला- वो बहुत बेवकूफ लड़की है। मैं आज के बाद कभी उससे बात नहीं करूँगा।

कारण पूछने पर पता चला कि छोटे मियाँ की "प्रेयसी" ने उस पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं व्यक्त की थी। पता नहीं वह उसका मतलब भी समझ भी पाई अथवा नहीं? लेकिन इस छोटी सी प्रेमकथा का यह पटाक्षेप देखकर मुझे सुकून भी मिला। मुझे लगा यदि मैंने इस छोटी सी बात पर कोई बखेड़ा खड़ा कर दिया होता, तो निश्चय ही इससे लड़के के दिमाग पर एक बुरा प्रभाव पड़ता और जिन्दगी भर के लिए उसके दिमाग में एक कॉम्प्लेक्स भर जाता।

तो ये रहा इस छोटी सी लव स्टोरी का अंत। आपकी नज़र में यह घटना क्या महत्व रखती है? बताइएगा ज़रूर। और हाँ, अगर आपका लड़का ऐसा करता, तो आप क्या करते?

कौन कहता है इस देश में प्रकाशकों की कमी है?



मुझे अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो प्रकाशकों का रोना रोते रहते हैं। प्रकाशक ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं, किताब छापते नहीं है, दौड़ाते बहुत हैं वगैरह-वगैरह। लेकिन अगर आप गहराई से देखिए तो क्या हमारे देश में प्रकाशकों की कमी है?

मेरी नज़र में तो कम से कम ऐसी बात नहीं है। कारण, इसी माह में "टिनी टॉट पब्लिकेशंस" ने एक साथ मेरी 6 पुस्तकें प्रकाशित की हैं। इनके नाम है- मनोवैज्ञानिक कहानियाँ, प्ररक कहानियाँ, सामाजिक बाल कथाएँ एवं इनके अंग्रेजी वर्जन। उक्त सभी किताबें बाल कहानियों का संग्रह हैं, जो 144 पृष्ठों की पुस्तकों के रूप में रंगीन चित्रो से सुसज्जित हैं। और पुस्तक का मूल्य है 135 रू0 मात्र। लगे हाथ बताता चलूँ कि इससे पहले भी वे मेरी इतनी ही पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं और पिछले एक साल से ही और पाण्डुलिपियों को भेजने की बात कह रहे हैं, किन्तु मैं अपनी व्यवस्तताओं के कारण ऐसा नहीं कर पा रहा हूँ।

"टिनी टॉट पब्लिकेशंस" देश का एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान है और देश मे ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सभी प्रमुख बुक स्टॉल पर इनकी किताबें आसानी से उपलब्‍ध हो जाती हैं। इस संस्थान से जब मेरी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई थी, तो इन्होंने पैसों को लेकर थोड़ी सी परेशानी खड़ी की थी। लेकिन मैं अपनी शर्तों से ज़रा भी नहीं डिगा और नतीजा आज आप सबके सामने है।

अब आप ही बताइए कि कहाँ है इस देश में प्रकाशकों की कमी? आप स्तरीय लेखन करें, प्रकाशक आपको सिर माथे पर बिठाएंगे। आखिर उन्हें भी तो स्तरीय रचनाएँ चाहिए। सही कहा न?

“इतना कायर हूँ कि उत्तर प्रदेश हूँ” : कैसे टूटे यह छवि?


आंकड़ों की बात करें तो शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां पर उत्तर प्रदेश ऊपर की ओर नज़र आता हो। बात चाहे शिक्षा की हो, रोजगार की हो, उद्योगों की हो या फिर स्वास्थ्य की, हमारी गिनती नीचे की ओर से शुरू होती है और हम तीसरे चौथे और पांचवे स्थान पर जाकर ठहर जाते हैं। लेकिन क्यों? इन्हीं सवालों से जूझते मिले लोग “हिन्दुस्तान” द्वारा आयोजित “समागम 2009” में।

लखनऊ के होटल ताज में दिनांक 27-10-2009 को आयोजित यह कार्यक्रम इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहा कि इसमें न सिर्फ विभिन्न राजनीतिक दलों के युवा चेहरे एक मंच पर इकटठा हुए और उत्तर प्रदेश की दशा और दिशा पर चर्चा की, बल्कि यह कार्यक्रम इस लिहाज से भी उल्लेखनीय रहा कि वहाँ पर जुटे लोगों ने प्रदेश की दशा को सुधारने के लिए खुले मन से अपने विचार रखे।

ऐसा नहीं कि बात सिर्फ वीआईपी वक्ताओं तक ही सीमित रही, ऐसा होता तो कार्यक्रम सिर्फ एक औपचारिकता बन कर रह जाता। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाले लगभग 200 लोगों ने न सिर्फ अपनी सहभागिता दर्ज की, बल्कि समय-समय पर अपने प्रश्न ही नहीं शंकाओं को भी वक्ताओं के सामने रखा और वक्ताओं तथा आयोजकों ने यथासम्भव तरीके से उनका उत्तर देने की कोशिश भी की।

वक्ताओं में जहां एक ओर सर्वश्री जितिन प्रसाद, जयंत चौधरी, सुभाषिनी अली और मुख्तार अब्बाज नकवी जैसे खांटी राजनीतिज्ञ जुटे, वहीं महेश भटट जैसे फिल्मकार, पर्यावरण की चेतना जगाने वाली नन्ही विदुषी युगरत्ना मौजूद थी, तो जमीन से जुड़े एक्टीविस्ट संदीप पाण्डे भी आम आदमी की बात कहने के लिए मौजूद रहे।

कार्यक्रम के संचालकों की ईमानदारी उनके प्रयासों में साफ झलक रही थी। अंधविश्वास के मुददे पर जब मैंने हिन्दुस्तान समूह के प्रधान संपादक शशि शेखर से मीडिया की भूमिका को कठघरे में खड़ा किया, तो उन्होंने पूरी ईमारदारी से स्वीकारते हुए कहा- “जब हम लोग पब्लिक के बीच में जाते हैं, तो जनता कभी हमें खौफ से और कभी घृणा से देखती है। समागम इन्हीं सब विषयों पर ध्यान देने और दूर करने की शुरूआत है। हम आप मिलकर कोशिश करेंगे, तो समाधान भी निकलेगा।”

परिणाम किसी भी क्षेत्र में हो एक दिन में नहीं निकलता, पर उसकी शुरूआत विचार से ही होती है। यह प्रसन्नता की बात है, गैर सरकारी स्तर पर ही सही उसकी शुरूआत हो चुकी है। आशा है आने वाले दिनों में इस तरह की कोशिशों से हम सब जुड़ेंगे और अपनी जिन्दगी के व्यस्त पलों में से कुछ लम्हे प्रदेश की बेहतरी के लिए भी खर्च करेंगे।

विकृत धर्म और बिगड़ैल साँड़ में से कौन ज्यादा खतरनाक है?



'धर्म का संबंध इससे नहीं है कि आप उसमें विश्वास करते हैं या नहीं करते। वह आपका विश्वास नहीं, आपका श्वास-प्रश्वास हो, तो ही सार्थक है। वह तो कुछ है- जो आप करते हैं या नहीं करते हैं- जो आप होते हैं, या नहीं होते हैं। धर्म कर्म है वक्तव्य नहीं।'-ओशो

मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं:
धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो , दसकं धर्म लक्षणम ॥
( धैर्य , क्षमा , संयम , चोरी न करना , शौच (स्वच्छता), इन्द्रियों को वश मे रखना ,
बुद्धि , विद्या , सत्य और क्रोध न करना ; ये दस धर्म के लक्षण हैं।)

जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ न करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रूत्वा चैव अनुवर्त्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषाम् न समाचरेत् ॥

पर आज धर्म का रूप कितना विकृत हो गया है, यह हमें पग-पग पर देखने को मिल जाता है। अभी एक सप्ताह पहले की बात है। इस दीपावली में मुझे अपनी ससुराल गोरखपुर जाना पड़ा। वहाँ पर घण्टाघर के पास मेरे एक साहित्यिक मित्र भी रहते हैं। उनसे मिलने के लिए जब मैं रविवार को दोपहर को उनके घर पहुंचा, तो पाया कि उनके पड़ोस में कोई सज्जन लक्ष्मी माँ का पांडाल लगा कर देवी का आवाहन कर रहे थे। दीपावली के अवसर पर देवी माँ का इस तरह से आवाहन करना गोरखपुर की एक जानी-मानी परम्परा है, जिसमें सड़क पर तम्बू-कनात लगाकर देवी को प्रतिष्ठित किया जाता है और उसमें हजार-हजार वाट के साउंड बॉक्स लगाकर 24 घण्टे सारे मोहल्ले को एक सप्ताह गुंजाया जाता है। (जाहिर सी बात है कि भला मुस्लिम कहां इस मामले में चूकने वाले हैं, इसलिए वे मोहर्रम में पूरे दस दिन धमाल मचा कर इसका “बदला” ले लेते हैं।)

चूंकि यह आयोजन मित्र के घर के ठीक बगल में हो रहा था, इसलिए जैसे ही इस प्रसंग पर बात चली, वे फट पड़े। बोले- इन सालों को हजार बार समझाया, मगर मूढ़ों को धर्म का मतलब कैसे समझ में आए? दूसरों को परेशान करना ही अपना सबसे बड़ा धर्म समझते हैं।  मेरे मित्र अम्बेडकरवादी विचारधारा को मानते हैं। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए जोड़ा- इन सबका एक ही उपाय है कि अम्बेडकर जयन्ती के दिन इनके दरवाजे पर आठ-आठ ऐसे साउंड बॉक्स लगाओ और चार दिन बजाओ। तब सालों की अक्ल ठिकाने आएगी।

मित्रवर का अन्तिम वाक्य सुनकर मैं सोच में पड़ गया। क्या इस प्रवृत्ति को बढ़ाने के पीछे यही “बदले” की भावना नहीं काम कर रही है? शायद यही कारण है कि वहाँ पर चाहे हिन्दू धर्म का कोई त्यौहार हो अथवा मुस्लिम धर्म का, इस तरह के आयोजन साल दर साल बढ़ते ही जा रहे हैं। और आश्चर्य का विषय यह है कि इसका अंजाम भी उन्हें ही भोगना पड़ता है, मानसिक तनाव, चिड़चिड़ाहट, हृदय और श्रवण सम्बंधी समस्याओं के रूप में। लेकिन उन्हें समझ में आए तब तो?

इस प्रवृत्ति का एक दूसरा रूप है सड़कों पर निकलने वाले धार्मिक जुलूस। (योगी जी की कृपा से पूरा पूर्वांचल इनकी चपेट में है।) अगर आप इस तरह के किसी जूलूस के रास्ते में आप गल्ती से आ गये, तो भलाई इसी में होती है कि आप अपना रास्ता बदल लें, फिर चाहे अस्पताल पहुंचने से पहले आपका दम निकल जाए, अथवा आपकी कोई इम्पार्टेन्ट ट्रेन ही क्यों न छूट जाए।

धर्म के इस विकृत होते रूप को देखकर कभी-कभी मेरे मन में मेरे एक नास्तिक मित्र (वैसे धर्म की इन विकृतियों को देखकर अपने आपको नास्तिक कहना मुझे भी अच्छा लगने लगा है) का कथन अक्सर दिमाग में गूंज उठता है। उसका सवाल था- विकृत धर्म और बिगड़ैल साँड़ में कौन ज्यादा खतरनाक होता है?

आपका क्या विचार है?

पुस्तक विमोचन के बहाने जुटे लखनऊ के ब्लॉगर्स

बाएं से दांए- जाकिर अली रजनीश, डा0 सुधाकर अदीब, श्री अनिल मिश्र
14 सितम्बर 2009, हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ में जाकिर अली "रजनीश" की पुस्तक "हिन्दी में पटकथा लेखन" का लोकापर्ण समारोह  भलीभांति सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम संस्थान के निदेशक डा0 सुधाकर अदीब के कर कमलों के द्वारा सम्पन्न हुआ। समारोह में लखनऊ के ब्लॉगर्स की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

"हिन्दी में पटकथा लेखन" फिल्म एवं टेलीविजन लेखन पर केन्द्रित एक शोधपरक पुस्तक है, जिसमें पटकथा लेखन की बारीकियों को उदाहरण के साथ बताया गया है। 200 पृष्ठों की यह पुस्तक रू० 150.00 में उपलब्ध है, जिसे इच्छुक व्यक्ति विक्रय अधिकारी, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ-226002 फोन 0522-2616465 से सम्पर्क करके मंगा सकते हैं।

 बाएं से दांए- पहली पंक्ति- श्री सर्वत जमाल, सुश्री अलका मिश्रा, श्री महफूज अली
दूसरी पंक्ति-श्री विनय प्रजापति, श्री जीशान हैदर जैदी, श्री सलीम खान
तीसरी पंक्ति- श्री यदुनाथ मुरारी, श्री जाकिर अली रजनीश, श्री गिरेजेश राव
लोकार्पण समारोह के बहाने यशपाल सभागार में लखनऊ के सक्रिय ब्लॉगर्स भी एकत्रित हुए। लखनऊ के ब्लॉगर्स की इतने बडे पैमाने पर यह पहली मुलाकात थी। इस अवसर पर उपस्थित रहने वाले ब्लॉगर्स के नाम हैं- श्री सर्वत एम0 जमाल, श्री गिरिजेश राव, श्री महफूज अली, श्री अमित ओम, श्री जीशान हैदर जैदी, श्री सलीम खान श्री विनय प्रजापति, सुश्री अलका मिश्रा तथा इन पंक्तियों का लेखक जाकिर अली "रजनीश"। हिन्दी दिवस समारोहों की व्यस्तता के चलते लखनऊ के दो अन्य ब्लॉगर सुश्री मीनू खरे एवं सुश्री कंचन सिंह चौहान जी नहीं उपस्थित हो सकीं, पर उन्होंने फोन के द्वारा अपनी शुभकामनाएं पहुंचाईं और अन्य साथी ब्लॉगर्स से न मिल पाने का अफसोस जताया।

इस बैठक के दौरान सर्वत जी ने इस तरह की बैठकों का सिलसिला बढाने का सुझाव रखा, जबकि महफूज का सुझाव था कि साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन की तरह  लखनऊ ब्लॉगर्स असोसिएशन का गठन किया जाए। हम लोगों का प्लान था कि कार्यक्रम के बाद कॉफी हाउस में बैठकर थोडी गपशप की जाएगी, पर अचानक मौसम बिगड जाने एवं कार्यक्रम विलम्ब से शुरू होने के कारण ऐसा न हो सका। हाँ, सभी ब्लॉगर्स की यह दिली इच्छा रही कि आगे भी इस तरह के मेल मिलाप के कार्यक्रम होते रहने चाहिए।

 बाएं से दांए- श्री जीशान हैदर जैदी, श्री सलीम खान, श्री यदुनाथ मुरारी, श्री विनय प्रजापति, श्री जाकिर अली रजनीश, सर्वत जमाल, सुश्री अलका मिश्रा, श्री महफूज अली

इस कार्यक्रम के कुछ फोटोग्राफ ओम भाई के सौजन्य से यहां पर उपलब्ध हैं। अन्य फोटोग्राफ तथा हिन्दी दिवस समारोह के चित्र देखने के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं।