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अन्‍तर्राष्‍ट्रीय कॉंफ्रेंस- विज्ञान संचार के द्वारा वैज्ञानिक मनोवृत्ति का विकास (International Conference- Science Communication for Scientific Temper)


विज्ञान कथाओं के द्वारा बच्‍चों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का विकास
-डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ 
10-12 जनवरी, 2012 को नई दिल्‍ली में आयोजित 'साइंस कम्‍युनिकेशन फॉर साइंटिफिक टेंपर' कॉंफ्रेंस में दिया गया वक्‍तव्‍य
परिचयः बच्चे कहानियॉँ पढ़ते या सुनते ही नहीं कहानियों में जीते भी हैं। उन्हें वक्त बे वक्त तरह-तरह की कहानियॉँ बनाते हुए भी देखा जा सकता है। बच्चों के लिए जो कहानियाँ लिखी जाती रही हैं, उनमें काफी समय से राजा-रानी और परियों का अधिपत्य रहा है। पर इधर के कुछेक वर्षों में बच्चों की दुनिया में तेजी से विज्ञान कथाओं का प्रवेष हुआ है। इस बदलाव की मुख्य वजहों में जहाँ एक ओर बच्चों की बदलती हुई रूचियाँ हैं, वहीं दूसरी ओर इलेक्ट्रानिक चैनलों के कारण पत्र-पत्रिकाओं के बदलते स्वरूप ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

राजा-रानी और परी-जादूगरों को लेकर लिखी गयी कहानियाँ मनोरंजक तो होती हैं किन्तु बच्चों के दिल में नहीं उतर पाती। क्योंकि आज के बच्चों को मालूम है कि अब सारी दुनिया में प्रजातन्त्र है। उन्हें यह भी पता होता है कि जादू नाम की कोई चीज नहीं होती है। वे जानते हैं कि अगर इस दुनिया में जादू के नाम पर कुछ है, तो वह है हाथ की सफाई।

आज के बच्चे आँख खोलने के साथ टीवी के रिमोट, मोबाइल और कम्प्यूटर के माउस से खेलना शुरू कर देते हैं। उन्हें मालूम है कि अगर उनकी दुनिया में कोई रंग भर सकता है, तो वे हैं इलेक्ट्रानिक गैजेट। बच्चों की इस बदलती रूचि के कारण बाल कहानियों में तेजी से विज्ञान कथाओं का प्रवेश हुआ है।

विज्ञान कथाएँ न सिर्फ बच्चों को सहज रूप में आकर्षित करती हैं, वरन उनकी कल्पना को नए आयाम भी प्रदान करती हैं। इसके अतिरिक्त क्या विज्ञान कथाएँ अपनी छिपी हुई शक्ति के द्वारा बच्चों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति के विकास का कार्य भी करती हैं?

यही इस शोधपरक आलेख का मूल बिन्दु है, जिसके अध्ययन के लिए निम्न बाल विज्ञान कथाओं का अध्ययन एवं विश्‍लेषण किया गया हैः

कुँए का भूत - विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी
नन्हा ज्योतिषी - डॉ0 अरविंद मिश्र
ढ़ोंगी महात्मा - ज़ाकिर अली ‘रजनीश’
नानी मां और सूर्यग्रहण - मालती वसंत
गणेश जी ने दूध पिया - राम वचन सिंह ‘आनंद’
प्लूटो तुम्हें क्यों निकाला - बुशरा अलवेरा
पीली धरती - साबिर हुसैन

कथानक परिचयः
गाँवों में आज भी यह मान्यता है कि जो स्थान खाली पड़े रहते हैं, वहाँ पर भूत-प्रेत अपना डेरा जमा लेते हैं। यदि ऐसी जगहों पर मनुष्य गल्ती से चले भी जाते हैं, तो भूत-प्रेत उनकी जान ले लेते हैं। विष्णु प्रसाद चतुर्वेद की कहानी ‘कुँए में भूत’ इसी विषय पर केन्द्रित है, जिसमें लेखक ने बहुत ही रोचक ढ़ंग से भूतिया घटनाओं का वर्णन किया है और उसके पीछे के रहस्य को उद्घाटित किया है।

ज्योतिष और खगोल विज्ञान का चोली-दामन का साथ होता है। लेकिन कुछ लोगों ने इसके आधार बना कर फलित ज्योतिष का धंधा शुरू कर दिया है, जिसमें वे लोगों के डर को निशाना बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। डॉ0 अरविंद मिश्र ने फलित ज्योतिष के इसी पाखण्ड को केन्द्र में रखकर ‘नन्हा ज्योतिषी‘ का कथानक बुना है।

हमारे समाज में चालाक और ढ़ोंगी लोगों की कमी नहीं है। ये लोग अक्सर विज्ञान के छोटे-मोटे प्रयोगों का सहारा लेकर चमत्कार दिखाने का दावा हैं और लोगों को ठगते हैं। जाकिर अली ‘रजनीश’ की कहानी ‘ढ़ोंगी महात्मा’ इसी विषय पर आधारित है, जिसमें रोचक ढ़ंग से एक साधु के छल और पाखण्ड का पर्दाफाश किया गया है।

मालती वसंत की कहानी ‘नानी माँ और सूर्यग्रहण’ सूर्य ग्रहण और उससे जुड़े अंधविश्‍वासों को लेकर लिखी गयी एक रोचक कहानी है। इसके माध्यम से लेखिका ने यह बताने का प्रयास किया है कि सूर्य ग्रहण एक प्राकृतिक व रोमांचक घटना है। और यदि सूर्य ग्रहण को वैज्ञानिक तरीके से देखा जाए, तो इससे कोई हानि नहीं होती है।

कुछ समय पहले सारे देश में एक अफवाह उड़ी थी कि गणेश जी की मूर्तियाँ दूध पी रही हैं। देखते ही देखते यह अफवाह सारे देष में फैल गयी थी, जिसकी वजह से लाखों लीटर दूध नाली में बहा दिया गया था। रामवचन सिंह ‘आनंद’ की कहानी ‘गणेशजी ने दूध पिया’ इसी घटना पर आधारित है, जिसमें लेखक ने इस अफवाह के कारणों का विष्लेषण किया है और उसके पीछे के रहस्य को पाठकों के सामने रखा है।

‘प्लूटो तुम्हें क्यों निकाला’ एक जानकारीपरक कहानी है, जिसमें वैज्ञानिकों द्वारा ग्रहों के लिए तय की गयी नई परिशषा के आधार पर ‘प्लूटो’ से ग्रह की पदवी छीन लेने की घटना को कहानी का आधार बनाया गया है और इस सम्बंध में पाठकों को रोचक ढ़ंग से जानकारी प्रदान की गयी है।

आज जिस तरीके से हमारी धरती से पेड़ों का विनाश किया जा रहा है, उससे यह आशंका होने लगी कि एक दिन धरती से सारे वृ़क्षों का सफाया हो जाएगा और इंसानों को साँस लेने के लिए कृत्रिम ऑक्सीजन का सहारा लेना पड़ेगा। इससे न सिर्फ मनुष्यों का जीवन कठिन हो जाएगा, वरन उसे अपने जीवन के लिए अभूतपूर्व चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा। साबिर हुसैन की लम्बी कहानी ‘पीली धरती’ में इसी विषय को कथानक बनाया गया है और इस समस्या को प्रभावकारी दिखाने के लिए एलीयंस का सहारा लिया गया है।

विवेचन और परिणामः
कुँए का भूत: अक्सर हमारे समाज में कुछ ऐसी घटनाएँ घटती रहती हैं, जो तात्कालिक रूप से समझ में नहीं आती। यही कारण है कि अंधविश्‍वास और अज्ञान से घिरा हुआ व्यक्ति उनके लिए भूत-प्रेत को जिम्मेदार मान लेता है। कहानी में इस तरह की घटना के पीछे के रहस्य को इतने सरल ढ़ंग से समझाया गया है कि पाठक के मन से भूत-प्रेत के पीछे का असली कारण समझ में आ जाता है और उसके मन में जमी हुई भूत-प्रेत सम्बंधी धारणा खण्डित हो जाती है।

नन्हा ज्योतिषी: ज्योतिष के मूल सिद्धान्तों को आधार बनाकर विकसित करने का दावा करने वाली फलित ज्योतिष की चर्चा आज जगह-जगह होती है। चालाक और कुटिल वृत्ति के व्यक्ति इसका सहारा लेकर सीधे-साधे लोगों को बेवकूफ बनाते हैं। ‘नन्हा ज्योतिषी‘ इन्हीं तथाकथित ज्योतिषियों के पाखण्ड को निषाना बना कर लिखी गयी है, जिसे पढ़कर पाठकों को ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष की जानकारी मिलती है और आज के तथाकथित ज्योतिषियों से बचकर रहने का संदेष भी प्राप्त होता है।

ढ़ोंगी महात्मा: अक्सर विज्ञान के छोटी-छोटी जानकारियों को आधार बनाकर पाखण्डी साधु लोगों को ठगने लगते हैं। यह भी एक ऐसी ही घटना पर आधारित कहानी है, जिसमें एक छोटी सी लड़की सुमाली न सिर्फ साधु के रहस्य का पर्दाफाश करती है, बल्कि उसे जेल की हवा भी खिलाती है। इससे पाठकों को यह संदेष मिलता है कि इस दुनिया में चमत्कारी शक्ति जैसी कोई चीज नहीं होती है। यदि कोई व्यक्ति इसका दावा कर रहा है, तो निष्चय ही किसी वैज्ञानिक नियम का सहारा लेकर लोगों को बेवकूफ बनाने का प्रयत्न कर रहा है।

नानी माँ और सूर्यग्रहणः यह एक जानकारीपरक कहानी है। लेकिन इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने सूर्यग्रहण के सम्बंध में फैले अंधविश्‍वास को भी निषाना बनाया है। जब पाठक इस कहानी को पढ़ते हैं तो उन्हें ज्ञात होता है कि सूर्य ग्रहण तो एक भौगोलिक घटना मात्र है। कहानी के माध्यम से पाठकों को यह संदेष भी मिलता है कि इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। यह एक रोमांचक संयोग है और यदि वैज्ञानिक एहतियातों का ध्यान रखा जाए, तो इस दुर्लभ क्षण का आनंद लिया जा सकता है।

गणेश जी ने दूध पियाः यह एक रोचक कहानी है, जिसमें मूर्तियों द्वारा दूध पीने की घटना का वैज्ञानिक आधार पर विचेन किया गया है। इस कहानी में लेखक ने बताया है कि जब दूध से भरा चम्मच किसी पत्थर के सम्पर्क में आता है, तो पृष्ठ तनाव के कारण दूध धीरे-धीरे चम्मच से निकल कर मूर्ति के सहारे जमीन पर बह जाता है और लोगों को लगता है कि दूध को मूर्ति ने पी लिया है। इस घटना के सम्पादन में मूर्ति के पत्थर में मौजूद सूक्ष्म कोषिकाएँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि उनके द्वारा कुछ प्रतिषत दूध पत्थर सोख लेता है। इससे लोगों को मूर्ति/पत्थर द्वारा दूध पीने का भ्रम होता है।

प्लूटो तुम्हें क्यों निकालाः यह एक जानकारीपरक कहानी है। इसके माध्यम से हालाँकि लेखिका ने यह बताने का प्रयत्न किया है कि वैज्ञानिकों ने ‘प्लूटो‘ से ग्रह की पदवी क्यों छीन ली है। लेकिन इसके साथ ही साथ कहानी के द्वारा यह भी पता चलता है कि वैज्ञानिकों के प्रत्येक काम के पीछे एक व्यवहारिक सोच एवं तर्कपूर्ण कार्य-शैली होती है। यह कहानी हमें बताती है कि यदि बदलते हुए समय के साथ हमारी सोच अथवा जानकारी पुरानी पड़ रही है, तो उसका त्याग करना ही समझदारी है।

पीली धरतीः यूँ तो ‘पीली धरती’ एक फैंटेसीपरक कहानी है, जिसमें किसी अन्य ग्रह से आए प्राणियों के सहारे लेखक ने कथानक को बुना है। लेकिन इस कहानी के मूल में पर्यावरण की अन्तः चेतना निहित है। कहानी को पढ़कर पाठक के मन में पर्यावरण के महत्व की बात घनीभूत हो जाती है। इससे न सिर्फ उसके मन में जमा पर्यावरण सम्बंधी कई वहम दूर होते हैं, वरन वह पर्यावरण संरक्षण के लिए भी प्रेरित होता है।

निष्‍कर्ष- उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बाल विज्ञान कथाएँ जहाँ एक ओर पाठकों को वैज्ञानिक जानकारियाँ उपलब्ध कराती हैं, उनका मनोरंजन करती हैं, वहीं अपने भीतर निहित वैज्ञानिक चिंतन धारा के कारण पाठकों के मन में जमे अज्ञान और अंधविष्वास के जाले का सफाया करती हैं और उनके भीतर वैज्ञानिक मनोवृत्ति का विकास करती हैं। 

(सह लेखिका: सुश्री बुशरा अलवेरा)

अधिकतर बालसाहित्‍यकार आत्‍ममुग्‍धता से ग्रस्‍त हैं -भैरूंलाल गर्ग

 ('जनसंदेश टाइम्‍स' में 15 जनवरी, 2012 को प्रकाशित)

डॉ0 भैरूंलाल गर्ग मूल रूप से बाल वाटिका के सम्‍पादक के रूप में जाने जाते हैं। मार्च 1196 से निरंतर प्रकाशित होने वाली यह एक अव्‍यवसायिक बाल पत्रिका है, जिसके कलेवर में जून 2011 से आमूलचूल परिवर्तन आया है। बच्‍चों के लिए निकलने वाली यह पत्रिका अब किशोरोपयोगी सामग्री के साथ प्रकाशित हो रही है। इसके साथ ही पत्रिका के द्वारा समालोत्‍मक/आलोचनात्‍मक लेखन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। बाल वाटिका में आए इस परिवर्तन ने जहाँ पत्रिका को एकाएक बाल साहित्‍यकारों के बीच चर्चा में ला दिया है, वहीं इसने बहुत से सवालों को भी जन्‍म दिया है। इन्‍हीं सवालों और बाल साहित्‍य के विभिन्‍न मुद्दों पर पत्रिका के सम्‍पादक डॉ0 भैरूंलाल गर्ग से विस्‍तार से चर्चा हुई। प्रस्‍तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-

प्रश्‍न: बच्‍चों की चर्चित पत्रिकाओं बालहंस, नंदन, चंपक, सुमन सौरभ, चकमक, बाल भारती, नन्‍हे सम्राट, चंदामामा के रहते आपको बाल वाटिका की आवश्‍यकता क्‍यों महसूस हुई थी?
उत्‍तर: आपने जितनी भी पत्रिकाओं के नाम गिनाए हैं, ये सारी की सारी व्‍यवसायिक पत्रिकाएँ हैं। इन्‍हें कोई न कोई व्‍यवसायिक घराना निकाल रहा है। ये पत्रिकाएँ इसलिए नहीं निकल रही हैं कि इन्‍हें बच्‍चों से कुछ लेना-देना है, ये इसलिए निकल रही हैं, क्‍योंकि ये बच्‍चों की पत्रिका के रूप में व्‍यवसायिक सम्‍भावनाएँ देख रही हैं। इनकी मुख्‍य दृष्टि बाजार के उत्‍पादों पर रहती है। बड़ी-बड़ी मल्‍टी नेशनल कम्‍पनियों के विज्ञापन इनके लक्ष्‍य होते हैं। चूँकि इन पत्रिकाओं को उन कम्‍पनियों से विज्ञापन लेने होते हैं, इसलिए वे उनके निर्देशानुसार संचालित होती हैं। यही कारण है कि ये पत्रिकाएँ सिर्फ शहरी पाठकों को लक्ष्‍य करके निकाली जाती हैं। इससे ग्रामीण और कस्‍बाई बच्‍चों की उपेक्षा होती है। इस उपेक्षा को ध्‍यान में रखते हुए तथा बाल साहित्‍य के समग्र रूप को प्रोत्‍साहन देने के लिए बालवाटिका के प्रकाशन की योजना बनी थी।

प्रश्‍न: सुनने में आया है पहले आप किसी और नाम से पत्रिका निकालने की योजना बनी थी?
उत्‍तर: जी हाँ, पहले पहल मैंने एक मित्र के साथ बाल मंजरी नाम से रजिस्‍ट्रेशन कराया था। जब पत्रिका का टाइटल मिल गया, तो मित्र महोदय से इस बारे में विचार-विमर्श हुआ। तब वे बताने लगे कि हम लोग पत्रिका का कार्यालय यहाँ पर खोलेंगे, उसमें इस आदमी को संपादक बनाएँगे, इन लोगों को विज्ञापन व्‍यवस्‍था का काम सौंपेंगे आदि-आदि। मित्र महोदय की बातें सुनकर मुझे बहुत आश्‍चर्य हुआ। मैं उनकी तमाम योजनाओं के हिसाब से फिट नहीं बैठ रहा था, इसलिए उनसे अलग हो गया। बाद में स्‍वतंत्र रूप से बाल वाटिका की योजना बनी और यह आप सबके सामने है।

प्रश्‍न: पिछले 15 वर्षों में डॉ0 भैरूलाल गर्ग की छवि एक कुशल सम्‍पादक के रूप में बनी है, जबकि आप स्‍वयं रचनाकार हैं। ऐसा क्‍यों?
उत्‍तर: आपने सही कहा, वैसे तो मेरे 10 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। कविताओं के भी कुछ संग्रह आए हैं। लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव में उनपर कभी कोई चर्चा नहीं हुई। मैं चाहता, तो पत्रिका के माध्‍यम से उनपर चर्चा करवा सकता था, पर यह मुझे पसंद नहीं। पत्रिका निकालने का मेरा उद्देश्‍य बाल साहित्‍य को बढ़ावा देना था, अपने साहित्‍य को बढ़ावा देना नहीं, इसीलिए मैं एक सम्‍पादक के रूप में जाना जाता हूँ।

प्रश्‍न: क्‍या 15 वर्षों के सतत प्रकाशन से उस लक्ष्‍य को हासिल करने में सफलता मिली?
उत्‍तर: नहीं। क्‍योंकि अक्‍सर यह विचार मन में घुमड़ते रहते थ‍े कि क्‍या बच्‍चों को रास्‍ता खोजो और रंग भरो की जरूरत रह गयी है? स्‍पष्‍ट रूप से नहीं। क्‍योंकि आज का बच्‍चा जल्‍दी प्रौढ़ हो रहा है, उसके सामने आज ज्‍यादा गम्‍भीर चुनौतियाँ हैं। इसलिए सोच-विचार के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि पत्रिका को किशोर पाठकों के रूप में परिवर्तित किया जाए, साथ ही इसमें बाल साहित्‍य की अन्‍य विधाओं पर भी सामग्री दी जाए, समीक्षात्‍मक और आलोचनात्‍मक सामग्री को बढ़ावा दिया जाए। और प्रसन्‍नता का विषय है कि इसका अच्‍छा परिणाम सामने आ रहा है। पत्रिका के बदले हुए स्‍वरूप को लोगों ने पसंद किया है। अब प्रौढ़ साहित्‍य लिखने वाले रचनाकार भी पत्रिका से जुड़ रहे हैं।

प्रश्‍न: आपकी दृष्टि में आज कैसे बाल साहित्‍य की आवश्‍यकता है?
उत्‍तर: यूँ तो बाल साहित्‍य को मनोरंजन का साधन माना गया है। पिछले 100 सालों से लगातार राजा-रानी, हाथी-घोड़ा की कहानियाँ सुनाई जा रही हैं। आज भी ज्‍यादातर ऐसी ही रचनाएँ रची जा रही हैं। जबकि आज का समय काफी बदल गया है। आज व्‍यक्ति आत्‍मकेन्द्रित हो गया है, भौतिकता ने समाज से संवदेनाओं का सफाया कर दिया है। आज के माँ-बाप भी बच्‍चों के कैरेक्‍टर की तुलना में कैरियर पर ज्‍यादा ध्‍यान देते हैं। यही कारण है कि बच्‍चों की संवेदनाएँ मर रही हैं, वे समाज से कट रहे हैं। इसी का दुष्‍परिणाम है कि समाज में स्‍वार्थपरता बढ़ रही है, वृद्धावस्‍था आश्रमों में भीढ़ बढ रही है। ऐसे में आवश्‍यकता इस बात की है कि बच्‍चों को चिंतनपरक साहित्‍य परोसा जाए। साहित्‍य ऐसा हो, जो बच्‍चों के भीतर संवेदनाओं को जगाए, साथ ही उसके आसपास के वातावरण को, समाज को समझने में मदद करे और उसके भीतर समाज की विसंगतियों से जूझने की शक्ति पैदा करे। तभी बच्‍चे का समग्र विकास संभव है, तभी स्‍वस्‍थ समाज का निर्माण सम्‍भव है।

प्रश्‍न: कुछ लोग बाल साहित्‍य में मनोरंजन को प्रमुखता देते हैं, कुछ लोग शिक्षा को। आपकी नजर में बाल सहित्‍य कैसा होना चाहिए?
उत्‍तर: बच्‍चे स्‍वभाव से चंचल होते हैं। वे एक जगह शान्‍त होकर नहीं बैठते। ऐसे में साहित्‍य के सामने यह चुनौती तो रहती ही है कि वह बच्‍चों को किस प्रकार एक जगह रोक कर रख सके। जाहिर सी बात है कि इसके लिए रोचकता या मनोरंजकता बाल साहित्‍य की पहली शर्त है। लेकिन साहित्‍य में यदि खाली मनोरंजन होगा, तो फिर उसकी उपयोगिता क्‍या रह जाएगी। इसी प्रकार यदि साहित्‍य में खाली शिक्षा या संदेश होगा, तो वह उबाऊ हो जाएगा। इसलिए साहित्‍य में दोनों का सामंजस्‍य होना चाहिए। अब यह संदेश साहित्‍य में किस तरह से दिया जाए, यह साहित्‍यकार के विवेक पर निर्भर करता है। कुछ लोग इसे अपनी कहानियों में इस तरह भिड़ाते हैं इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि...। स्‍पष्‍ट सी बात है कि ऐसे साहित्‍य को बच्‍चे भी रिजेक्‍ट कर देते हैं। लेकिन कुछ लोग संदेश को अपनी रचना में इस तरह उतार देते हैं, जैसे पानी में घुली हुई जीवन दायिनी ऑक्‍सीजन। पानी को देखो, तो वह दिखाई नहीं पड़ती। जब साहित्‍यकार में इतनी कुशलता आ जाती है, तभी उसकी कलम से ईदगाह और पंच परमेश्‍वर जैसी रचनाएँ निकलती हैं।

प्रश्‍न: कहा जा रहा है कि ये उत्‍तर आधुनिकता का दौर है, जिसमें विचारधाराएँ मर रही हैं, साहित्‍य समाप्‍त हो रहा है। ऐसे में बाल साहित्‍य का क्‍या भविष्‍य है?
उत्‍तर: प्रौढ़ साहित्‍य में इस तरह के शिगूफे अक्‍सर छोड़े जाते रहे हैं। कहाँ साहित्‍य मर रहा है? मुझे तो ऐसा कहीं नहीं दिखाई देता। आज पहले की तुलना में ज्‍यादा पत्रिकाएँ निकल रही हैं। हाँ, ये सच है कि साहित्‍य का ट्रेंड बदल गया है, लोगों की रूचि में बदलाव आया है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि बच्‍चे अब किताबें पसंद नहीं करते। ऐसे लोगों की बातें सुनकर हंसी आती है, क्‍योंकि वे लोग या तो बच्‍चों को नहीं जानते, या फिर किताबों को नहीं पढ़ते। आप बच्‍चों को किताबें दे कर देखिए। वे आज भी पढ़ते हैं। ये अलग बात है कि अभिभावक कोर्स में पिछड़ जाने के डर से उन्‍हें कविता-कहानी की किताबें दिलाने से डरते हैं। अगर दिलाते भी हैं, तो सिर्फ आईक्‍यू बढ़ाने वाली किताबें। इसका मतलब यह नहीं है कि बच्‍चे साहित्‍य को पसंद नहीं करते। हम सब जानते हैं कि बच्‍चों के ऊपर आज माता-पिता की की अपेक्षाओं का ज्‍यादा बोझ है। इस बोझ के कारण वे चिड़चिड़े हो रहे हैं, क्रोधी हो रहे हैं। ऐसे में बच्‍चों के लिए साहित्‍य की आवश्‍यकता पहले से अधिक बढ़ गयी है। अगर बच्‍चों के भीतर संवेदनाओं को बचाए रखना है, उनमें इन्‍सानियत के भाव जगाए रखना है, तो उन्‍हें साहित्‍य से जोड़कर रखना ही होगा।

प्रश्‍न: आजकल पत्र-पत्रिकाओं में जो साहित्‍य देखने में आता है, उसमें मौलिकता और नवीनता के दर्शन बहुत कम होते हैं। इसके पीछे क्‍या वजह है?
उत्‍तर: इसके मुख्‍य रूप से दो कारण हैं। पहला यह कि बाल साहित्‍य में गुरू-शिष्‍य जैसी कोई परम्‍परा विकसित नहीं हो पाई है। इसलिए ज्‍यादातर लोग पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली रचनाओं को देखकर ही उसे असली साहित्‍य समझ लेते हैं और उसी के जैसी रचनाएँ लिखने लगते हैं। दूसरी वजह यह है कि बाल साहित्‍य में आलोचनात्‍मक अथवा समालोचनात्‍मक लेखन न के बराबर हुआ है। इसलिए बाल सहित्‍य में जो स्‍तरीय लेखन हुआ भी है, उसकी चर्चा नहीं हो पाती है, उसके बारे में सभी लोगों को जानकारी नहीं हो पाती है। इस तरह की कमी को बाल साहित्‍य की स्‍तरीय कृतियों पर चर्चा करा के दूर किया जा सकता है। पर दुर्भाग्‍यवश बाल साहित्‍य में ऐसी भी कोई परम्‍परा नहीं है। इसलिए भी अच्‍छी कृतियाँ आम पाठकों के सामने आने से रह जाती हैं और नवोदित लेखक बहुतायात में लिखी जाने वाली रचनाओं को ही असली साहित्‍य समझ कर उसी के जैसा लेखन करने लगते हैं। इससे एक ओर लेखक की प्रतिभा पूर्ण रूप से विकसित होने से रह जाती है, दूसरी ओर बाल साहित्‍य भी उस लेखक का सर्वोत्‍तम पाने से रह जाता है।

प्रश्‍न: हिन्‍दी बाल साहित्‍य में आलोचनात्‍मक लेखन का विकास न हो पाने के क्‍या कारण हैं?
उत्‍तर: इसके कई कारण हैं। पहला कारण तो यही है कि लोगों में इसकी समझ ही नहीं है। इस वजह से जो आलोचनात्‍मक लेखन हुआ भी है, उसमें या तो सिर्फ प्रशंसा है, या फिर सिर्फ आलोचना। दूसरा कारण यह है कि इस तरह के लेखन के प्रकाशन के लिए माध्‍यम नहीं हैं। अगर लेखक लिखे भी, तो वह प्रकाशित कहाँ हो? बिना प्रकाशन के लेखन व्‍यर्थ हो जाता है। तीसरी समस्‍या यह भी है कि अधिकतर लेखक आत्‍ममुग्‍धता से ग्रस्‍त हैं। वे अपने लेखन को सर्वश्रेष्‍ठ समझते हैं। वे स्‍वयं नहीं चाहते कि उनकी कृतियों पर आलोचनात्‍मक लेखन हो। और अगर कोई गल्‍ती से किसी व्‍यक्ति पर लिख भी दे, तो वे उससे दुश्‍मनी गाँठ लेते हैं, उसे अपना दुश्‍मन समझने लगते हैं।

प्रश्‍न: बाल साहित्‍य पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि उसमें जीवंतता का अभाव है, वह पाठकों से रागात्‍मक सम्‍बंध नहीं बना पाता है। क्‍या यह सच है? अगर हाँ, तो इसकी क्‍या वजह है?
उत्‍तर: देखिए, हम सब यह तो जानते ही हैं कि पिछले दो दशकों से समाज में जबरदस्‍त बदलाव आया है, समाज से नैतिकता, मानवता, संवेदनात्‍मकता, ईमानदारी, कर्तव्‍यपरायणता जैसे गुणों का ह्रास हुआ है। अब चूँकि साहित्‍यकार भी समाज का अंग है, तो उसमें भी यह कमी परिलक्षित होती है। इसी वजह से साहित्‍यकारों में समर्पण की भावना में कमी हुई है, वे लेखन के प्रति उतने ईमानदार नहीं रहे। जाहिर सी बात है कि इस सबका उनके लेखन पर असर तो पड़ेगा ही। लेकिन यह सिर्फ बाल साहित्‍यकारों की समस्‍या नहीं है, यह समस्‍या शेष साहित्‍य में भी विराजमान है। इसीलिए अब आम जनता साहित्‍य से उतना जुड़ाव नहीं महसूस करती। यह सचमुच गम्‍भीर समस्‍या है। लेकिन इसका हल भी साहित्‍यकारों के पास है। जिस दिन वे जैसा लिखते हैं, वैसा जीवन जीने लगेंगे, उनके साहित्‍य में फिर से वह जीवंतता आ जाएगी और वे फिर से पाठकों के अधिक निकट पहुँच सकेंगे।

प्रश्‍न: बाल साहित्‍य के उन्‍नयन के लिए क्‍या किया जाना चाहिए?
उत्‍तर: असली समस्‍या यह है कि बच्‍चों की किसी को चिन्‍ता ही नहीं है। न अभिभावक बच्‍चों की आवश्‍यकताएँ समझ रहे हैं, न सरकार इस ओर ध्‍यान दे रही है। आज देश में बच्‍चों का प्रतिशत कुल आबादी का 25 प्रतिशत है। लेकिन सरकारी स्‍तर पर देखिए तो केन्‍द्र से सिर्फ एक पत्रिका निकल रही है बच्‍चों के लिए। मध्‍य प्रदेश में अवश्‍य इस दिशा में अच्‍छा काम हो रहा है। जबकि सरकार ने ढ़ेर सारी अकादमियाँ बना रखी हैं। हर प्रदेश में ऐसी अकादमियाँ हैं। इन अकादमियों से बड़ों की पत्रिकाएँ तो निकल रही हैं, पर बच्‍चों के साहित्‍य पर ध्‍यान नहीं दिया जा रहा है। जबकि ये बच्‍चे ही कल के भविष्‍य हैं, इनके ही हाथों में कल राष्‍ट्र की बागडोर होगी। इसलिए आवश्‍यकता इस बात की है कि हर अकादमी से बच्‍चों के लिए एक बाल पत्रिका का प्रकाशन हो, जिनमें बच्‍चों के लिए साहित्‍य का प्रकाशन हो और उनकी आवश्‍यकताओं और समस्‍याओं पर चर्चा की जाए। इसके अलावा सभी स्‍कूलों की लाइब्रेरी अनिवार्य की जाए और बच्‍चों तक किताबों की पहुँच सुनिश्चित की जाए। इससे बाल साहित्‍य को बढ़ावा मिलेगा और ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग बाल साहित्‍य से जुड़ सकेंगे।

डरा रही है मुई दिल्‍ली की सर्दी।

सर्दी के कई रंग 
अभी-अभी फेसबुक पर पंकज चतुर्वेदी जी की टिप्‍पणी देखी, जिसमें उन्‍होंने बताया है कि दिल्‍ली में हाड़ कंपा देने वाली सर्दी पड़ रही है। इसके अलावा भी कई मित्रों से इधर चर्चा हुई, सभी ने बताया कि लखनऊ की तुलना में वहाँ पर ज्‍यादा ठण्‍ड है। चूँकि मुझे भी दिल्‍ली पहुंचना है, इसलिए  मुझे सुन-सुन कर ही ठण्‍ड लगने लगी है।

दिनांक 10-12 जनवरी, 2012 को नास्‍क (NASC) कॉम्‍प्‍लेक्‍स, पूसा, नई दिल्‍ली में में साइंस कम्‍युनिकेशन पर अन्‍तर्राष्‍ट्रीय कॉन्‍फ्रेंस का आयोजन हो रहा है। यह कॉन्‍फ्रेंस नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ साइंस कम्‍यूनिकेशन एण्‍ड इनफार्मेशन रिर्सोसेस (NISCAIR-CSIR) की डायमण्‍ड जुबली के उपलक्ष्‍य में आयोजित की जा रही है, जिसमें नेशनल काउंसिल फॉर साइंस एण्‍ड टेक्‍नालॉजी कम्‍यूनिकेशन (NCSTC-DST) एवं विज्ञान प्रसार भी सहयोग कर रहा है। कॉन्‍फ्रेंस का केन्‍द्रीय विषय है साइंस कम्‍युनिकेशन फॉर साइंटिफिक टेम्‍पर। इसमें भाग लेने के लिए देश-विदेश के 100 से अधिक साइंस कम्‍युनिकेटर दिल्‍ली में जुट रहे हैं।

इस कॉन्‍फ्रेंस में भाग लेने के लिए इस नाचीज को भी मौका मिल रहा है। मुझे 11 जनवरी को ए0पी0 शिन्‍दे हॉल में 02-3.30 बजे साइंस फिक्‍शन: ए वे टू बिल्‍ड साइंटिफिक टेम्‍पर सत्र में विज्ञान कथाओं के द्वारा बच्‍चों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का विकास विषय पर अपना पेपर पढ़ना है। यह पेपर मैंने युवा विज्ञान कथाकार बुशरा अलवेरा के साथ मिलकर तैयार किया है। इस सत्र की अध्‍यक्षता डॉ0 अरविंद मिश्र जी कर रहे हैं।
कार्यक्रम की तैयारियाँ हो गयी हैं, आज रात में मुझे दिल्‍ली के लिए निकलना है। पर न जाने क्‍यों रह-रह कर दिल्‍ली की सर्दी डरा रही है?

दिल्‍ली में तो बहुत सारे मित्र हैं। और हाँ, ब्‍लॉगरों की भी तो कमी नहीं है। वैसे ब्‍लॉगर दर्शन बवेजा जी भी हरियाणा से कॉन्‍फ्रेंस में भाग लेने आ रहे हैं। देखना ये है इस कड़कड़ाती सर्दी में किस-किस से मुलाकात हो पाती है?

अरे आप क्‍यों कुड़कुड़ाने लगे? लीजिए, इस हॉट गर्ल आई मीन गाने को देखिए और अपनी सर्दी को दूर भगाइए।


राजनेताओं के भरोसे न रहें मुसलमान।


 ('जनसंदेश टाइम्‍स' में 27 दिसम्‍बर, 2011 को प्रकाशित)
यह सच है कि इंडोनेशिया के बाद विश्‍व में सबसे ज्‍यादा मुसलमान भारत में रहते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जो स्थिति इंडोनेशिया जैसे पिछड़े देश के मुसलमानों की है, भारत में भी कमोबेश स्थिति वही है। यूँ तो वर्तमान में डॉ0 अब्‍दुल कलाम आजाद से लेकर अजीम प्रेमजी, सानिया मिर्जा, शाहरूख खान और ए.आर. रहमान जैसे कुछ बेहद चमकीले नाम गिनाए जो सकते हैं, जो मुस्लिम वर्ग से ताल्‍लुक रखते हैं, पर यह भी कटु सत्‍य है कि एक आम आदमी के दिमाग में मुस्लिम शब्‍द कौंधते ही जो छवि कौंधती है, वह बहुत अच्‍छी नहीं होती। हैरत की बात यह है कि न तो इस बात के लिए मुसलमान चिंतित नजर आते हैं, न मुस्लिम जमातें और सरकार या राजनैतिक दलों का तो खैर कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता, क्‍योंकि उनका काम ही होता है वोट से मतलब रखना और येन-केन-प्रकारेण जनता का दोहन करना।

ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि मुस्लिमों की इस हालत का जिम्‍मेदार कौन है? क्‍या सिर्फ सरकार और सियासतदाँ? हालाँकि ज्‍यादातर मुस्लिमों की राय यही है, पर सच यह है कि उनकी इस हालत के लिए जिम्‍मेदार हैं खुद मुस्लिम, और उनके दिमाग पर हावी धार्मिक जकड़न। इस दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति को बढ़ाने में बाबरी मस्जिद काँड, उसके बाद देश में हुए हिन्‍दू-मुस्लिम दंगों तथा गुजरात के नरसंहार ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। इन घटनाओं तथा इनकी वजह से देश में पैदा हुए राजनैतिक हालात ने मुस्लिमों में असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है। यही कारण है कि आम मुसलमान के दिमाग में उसके अस्तित्‍व की चिंता हर समय हावी रहती है। ऐसे में उसे उम्‍मीद की किरण सिर्फ और सिर्फ धर्म में दिखाई देती है। यही कारण है कि मुस्लिम समाज में जमात और इस्तिमा जैसी गतिविधियाँ तेज हुई हैं और मदरसों में भीड़ तेजी से बढ़ी है।

हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि मुस्लिमों में सिर्फ कम पढ़े-लिखे युवा और प्रौढ़ ही नहीं, शिक्षित वर्ग का एक बहुत बड़ा समूह भी जमात से जुड़ रहा है। जमात एक तरह की स्‍वयंसेवा है, जिसमें प्रत्‍येक शहर में स्थित मरकज़ (धार्मिक संगठन) के नेतृत्‍व में मुस्लिम व्‍यक्ति अपने खर्चे पर देश के किसी स्‍थान पर जाते हैं और वहाँ पर एक निश्चित अवधि तक जन-सम्‍पर्क करके स्‍थानीय निवासियों को रोज़ा, नमाज, कुरान से नजदीकी बढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके अलावा धार्मिक सम्‍मेलन के रूप में आयोजित होने वाले इस्तिमा जैसे कार्यक्रम भी हाल के वर्षों में काफी तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। गौरतलब है कि ये गतिविधियाँ यूँ तो मुस्लिमों को संगठित रहने एवं उनमें धार्मिक भावनाओं के प्रसार के लिए आयोजित की जाती हैं, लेकिन खेदजनक यह है कि इनसे मुस्लिमों में धार्मिक जकड़न बढ़ रही है और उनके सामने पहले की तुलना में शिक्षा, आर्थिक और समाजिक स्‍तर पर और ज्‍यादा पिछड़ने का खतरा पैदा हो रहा है।

दुर्भाग्‍यपूर्ण यह भी है कि देश की आबादी में 15 से 20 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी रखने वाले मुस्लिम समाज के पास कोई कायदे का रहनुमा तक नहीं है। ऐसे में वे धार्मिक नेताओं की ओर देखने के लिए मजबूर हो जाते हैं। और जैसी कि धार्मिक नेतृत्‍वकर्ताओं की सोच होती है, वे धार्मिक बातों के बारे में तो हद से ज्‍यादा उत्‍सुक नजर आते हैं, पर दुनियावी दशा के बारे में पूरी तरह से आँखें मूँदे रहते हैं। उन्‍हें लगता है कि अगर मुसलमान पूरी तरह से धार्मिक हो जाएगा, तो उसकी सारी समस्‍याएँ अपने आप समाप्‍त हो जाएँगी। इस एकाँगी सोच के कारण ज्‍यादातर मुस्लिम अरबी को पढ़ लेने की योग्‍यता को ही असली शिक्षा समझने लगते हैं और इबादत का तरीका जान लेने भर को ही सफल जीवन का मूलमंत्र मान बैठते हैं। इसका खामियाजा यह होता है कि आधुनिक शिक्षा के प्रति उनके मन में अरूचि पैदा हो जाती है और वे सामाजिक रूप से ही नहीं आर्थिक स्‍तर पर भी पिछड़ते चले जाते। ऐसे में धीरे-धीरे उन्‍हें लगने लगता है कि देश में मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है और साजिश के तहत उन्‍हें रोजगार से दूर रखा जाता है। आश्‍चर्य का विषय यह है कि अशिक्षित और निचले तबके के लोग ही नहीं शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से सम्‍पन्‍न मुस्लिम भी इस मानसिकता से ग्रस्‍त पाए जाते हैं। इस‍ीलिए वे लोग धार्मिक प्रतीकों का ज्‍यादा से ज्‍यादा इस्‍तेमाल करते हैं, धार्मिक गतिविधियों में ज्‍यादा से ज्‍यादा रूचि लेते हैं और यहाँ तक कि अपने धर्म के समूह के साथ ही रहना और सम्‍पर्क स्‍थापित करना ज्‍यादा पसंद करते हैं। अपने समूह के साथ सुरक्षित रहने की इस भावना के कारण ही शायद वे छोटे परिवार के महत्‍व को समझ नहीं पाते और प्रकारांतर से ठीक-ठाक कमा लेने के बावजूद कष्‍टप्रद स्थितियों में जीवन जीने के लिए मजबूर होते हैं।

ऐसा नहीं है कि मुस्लिम धर्म की संरचना ही रूढि़यों को लेकर हुई हो। यदि मुस्लिम धर्म की स्‍थापना के दौर को ही देखा जाए, तो उस समय अरब की जो सामाजिक स्थितियाँ थीं, उसमें ढ़ेर सारी सामाजिक बुराईयाँ जड़ जमाए हुए थीं। मोहम्‍मद साहब ने एक क्रान्तिकारी चेतना के रूप में उनसे विद्रोह करते हुए प्रगतिशील विचारधारा को जन्‍म दिया था। यही कारण था यह धर्म तेजी से सम्‍पूर्ण विश्‍व में फैला था। लेकिन कालान्‍तर में वैचारिक जागरूकता के अभाव में उसका नियंत्रण कुछ ऐसे लोगों के हाथों में आ गया, जोकि लकीर के फकीर ज्‍यादा थे, वैचारिक चेतना सम्‍पन्‍न कम। यही कारण था कि उन्‍होंने मोहम्‍मद साहब के इल्‍म हासिल करने के लिए अगर तुम्‍हें सात समंदर पार भी जाना हो तो जरूर जाओ जैसे कथन को भी धार्मिक शिक्षा तक ही समेट कर रख दिया। ऐसे में मुस्लिम समाज में धार्मिक जकड़न दिनों दिन बढ़ती चली गयी और आम मुसलमान आधुनिक शिक्षा और प्रकारान्‍तर में विकास से दूर होता चला गया।

गहराई से देखा जाए, तो मुस्लिम धर्म में आपसी सम्‍पर्क की एक सशक्‍त परम्‍परा मौजूद है। पाँच वक्‍त की नमाज़ को अगर छोड़ भी दिया जाए, तो सप्‍ताह में एक दिन होने वाली जुमे की नमाज में प्राय: हर मुस्लिम व्‍यक्ति मस्जिद में इकट्ठा होता है। जुमे की नमाज शुरू होने से पहले मौलवी के द्वारा समूह को खुत्‍बा के रूप में सम्‍बोधित करने की परम्‍परा है। (खुत्‍बे का आशय तकरीर से होता है। अरब में जब इसकी शुरूआत हुई थी, तो इस तरकरीर में सप्‍ताह भर के धर्म से जुड़ी गतिविधियों का जिक्र किया जाता था। लेकिन बाद में यह एक रूढि़ बन गया और उसे एक मुद्रित संदेश के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। जबकि आज के हालात को देखते हुए जरूरत यह है कि इसे वा‍स्‍तविक स्‍वरूप प्रदान करते हुए एक जीवंत तकरीर का रूप दिया जाए और उसके द्वारा मुस्लिमों की धार्मिक चिंताओं के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक दुश्‍वारियों को भी उसमें शामिल किया जाए।) जुमे के अतिरिक्‍त मुस्लिम समाज में मीलाद, कुरानख्‍वानी, जमात और इस्तिमा जैसे आयोजन हैं, जिनमें लगभग सभी मुस्लिम भागीदारी करते हैं। इसलिए इन धार्मिक आयोजनों का उपयोग करके मुस्लिमों में सामाजिक एवं आर्थिक चेतना जगाने का काम आसानी से किया जा सकता है।

आज समाज के जैसे हालात हैं, उससे साफ लगता है कि न तो कोई राजनैतिक दल अथवा कोई सरकार मुसलमानों का भला करना चाहती है। ऐसे में मुसलमानों और विशेषकर मुस्लिम धार्मिक संगठनों को इस विषय पर सोचना होगा। मुस्लिम धार्मिक संगठनों को चाहिए कि वे प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाएँ और मुस्लिमों की धार्मिक चेतना के साथ-साथ उनकी सामाजिक और आर्थिक दशाओं के बारे में भी सोचें और उनकी दुनियावी बेहतरी के लिए भी आगे बढ़ कर आएँ। इससे न सिर्फ मुस्लिमों की सामाजिक और आर्थिक हैसियत में सुधार होगा वरन उनके प्रति दुनियावालों की सोच में भी बदलाव आएगा। और जाहिर सी बात है, इससे आम मुसलमान की नजरों में धार्मिक संगठनों का महत्‍व भी बढ़ेगा, लोग उनसे जुड़ने में ज्‍यादा खुशी का अनुभव करेंगे।

विज्ञान कथा के 100 साल: जहां से चले थे, वही पर खड़े हैं हम?

('जनसंदेश टाइम्‍स' में प्रकाशित रविवारीय परिशिष्‍ट)

(इसी के साथ परिशिष्‍ट में विज्ञान कथा के सम्‍बंध में विद्वानों के विचार भी प्रकाशित किये गये हैं। उन्‍हें पढ़ने के लिए कृपया यहां पर क्लिक करें।)

पता नहीं भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु का यह कैसा प्रभाव है कि यहाँ के जनमानस में कभी ज्ञान-विज्ञान के प्रति सकारात्‍मक माहौल बन ही नहीं पाया? इसके विपरीत समाज में लोकविश्‍वास के नाम पर अंधविश्‍वास न सिर्फ पीढ़ी दर पीढ़ी प्रगाढ़ होते रहे हैं, वरन उन्‍होंने ज्ञान एवं अन्‍वेषण की प्राचीन परम्‍परा को विनष्‍ट करने का कार्य भी किया है। यह किसी से छिपा नहीं है कि हमारे देश ने सुश्रुत, चरक, आर्यभट एवं भास्‍कराचार्य जैसे महान वैज्ञानिक दुनिया को दिये हैं, जिन्‍होंने अपने ज्ञान-विज्ञान के द्वारा सारी दुनिया का नेतृत्‍व किया है। किन्‍तु हैरानी की बात यह है कि आर्यभट तक आते-आते चिंतन की वह वैज्ञानिक धारा क्षीण पड़ने लगती है। यही कारण है कि जब आर्यभट अपने अध्‍ययन के आधार पर लोक मान्‍यता के विपरीत जाकर यह कहने का साहस जुटाते हैं कि धरती अपने अक्ष पर घूमती रहती है, जिसके कारण हमें खगोल घूमता हुआ नजर आता है, तो ब्रह्मगुप्त जैसा वैज्ञानिक भी उनकी सख्‍त आलोचना करता हुआ पाया जाता है।

यूँ तो कहने को हमारे देश में घाघ और भड्डरी जैसे जनकवि भी हुए हैं, जिन्‍होंने अपने अध्‍ययन एवं पर्यवेक्षण के आधार पर खेती एवं मौसम से सम्‍बंधित तर्कपूर्ण ज्ञान को कहावतों के रूप में सहेजा है, जिसका फायदा किसान सहज रूप में उठाते रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद हमारे समाज में अतार्किक एवं अवैज्ञानिक धारणाओं का इतना ज्‍यादा बोलबाला है कि एक ओर जहाँ आम आदमी उनके वशीभूत होकर अपना अनर्थ करवाता रहता है, वहीं समर्पित साहित्‍यकार भी अनजाने में मंत्र (प्रेमचंद) जैसी कहानियों और एक बूँद (अयोध्‍या सिंह उपाध्‍याय हरिऔध) जैसी कविताओं के द्वारा परोक्ष रूप में उसका प्रचार/प्रसार करते नजर आते हैं। भले ही आज के समय में यह एक प्रामाणिक जानकारी है कि न तो किसी मंत्र के द्वारा किसी जहरीले साँप का विष उतारा जा सकता है और न ही मोती बनने की प्रक्रिया का स्‍वाति नक्षत्र की पहली बूँद से कोई सम्‍बंध होता है, बावजूद इसके ये और ऐसी तमाम रचनाएँ बच्‍चों को पढ़ाई जा रही हैं, बिना इस बात की चिन्‍ता किए कि इसके दुष्‍प्रभाव कितने घातक हो सकते हैं।

हालाँकि साहित्‍यकार का दायित्‍व यह भी होता है कि वह अपनी रचनाओं के द्वारा सत्‍य को सामने लाए और समाज में फैले ढ़ोंग और पाखण्‍ड का विनाश करे। किन्‍तु दुर्भाग्‍यवश यहाँ पर प्रारम्‍भ से ही स्थितियाँ कुछ ऐसी रही हैं कि साहित्‍यकार भी अक्‍सर अतार्किक और अंधविश्‍वास सम्‍बंधी धारणाओं के‍ विखण्‍डन के स्‍थान पर उसे पुष्पित-प‍ल्‍लवित करते हुए नजर आते हैं। यही कारण है कि सहित्यिक ग्रन्‍थों में हीरा चाटकर मरने जैसे झूठे विश्‍वास और ज्‍योतिषियों द्वारा प्रामाणिक भविष्‍यवाणी करने जैसे भ्रामक प्रसंग खूब देखने को मिलते हैं।
समाज में व्‍याप्‍त इन अवैज्ञानिक एवं अंधविश्‍वासों के विरूद्ध जागरूक करने का एक सशक्‍त माध्‍यम विज्ञान कथाएँ भी हैं। विज्ञान कथाओं के लेखन की शुरूआत यूँ तो पश्चिम में हुई, लेकिन अन्‍य साहित्यिक प्रवृत्तियों की ही भाँति आज यह भारत में खूब प्रचलित है और लगभग समस्‍त भारतीय भाषाओं में बड़े पैमाने पर लिखी जा रही है।

विज्ञान कथा के मानदण्‍ड:
विज्ञान कथा के लिए अंग्रेजी साहित्‍य में मुख्‍य रूप से दो शब्‍द प्रचलित हैं। साइंस फिक्‍शन और साइंस फैंटेसी। फिक्‍शन एक लैटिन शब्‍द है, जिसका अर्थ होता है आविष्‍कार करना। जबकि फैंटेसी यूनानी शब्‍द है, जिसका अर्थ कल्‍पना करने से लगाया जाता है। यही कारण है कि विज्ञान कथा के रूप में अंग्रेजी साहित्‍य में मुख्‍य रूप से दो तरह की विज्ञान कथाएँ देखने को मिलती हैं। साइंस‍ फिक्‍शन के अन्‍तर्गत वे रचनाएँ आती हैं, जो विज्ञान के मान्‍य नियमों से बंधी होती हैं और उनके आसपास रची जाती हैं। जबकि साइंस फैंटेसी में ऐसी कोई सीमा नहीं होती। उसमें रचनाकार विज्ञान के नियमों से इतर भी कल्‍पना की उड़ान भरते पाए जाते हैं। हिन्‍दी में इन दोनों प्रकार की रचनाओं के लिए आमतौर से विज्ञान कथा का ही प्रयोग किया जाता है। यद्यपि कुछ लोग बंग्‍ला साहित्‍य के प्रभाव के कारण इसे विज्ञान गल्‍प अथवा विज्ञान की प्रधानता के कारण वैज्ञानिक कहानी भी कहते पाए जाते हैं, पर यह आमतौर से विज्ञान कथा के रूप में ही जानी जाती है।

यदि विज्ञान कथा की परिभाषा की बात की जाए, तो संक्षेप में कहा जा सकता है कि जो कथा विज्ञान को केन्‍द्र में रखकर बुनी जाए, वह विज्ञान कथा कहलाती है। यदि इस परिभाषा को थोड़ा और विस्‍तार दिया जाए, तो हम कह सकते हैं कि जो कथा वैज्ञानिक सिद्धाँतों, प्रकियाओं के फलस्‍वरूप उपजी हो, जिस रचना में विज्ञान संभाव्‍य कहानी को केन्‍द्र में रखा गया हो अथवा जो कथा विज्ञान को केन्‍द्र में रखकर कल्‍पना की बेलौस उड़ान भरती हो, वह विज्ञान कथा कहलाने की अधिकारी है। लेकिन इस उड़ान के लिए भी यह जरूरी है कि उसमें विज्ञान के ज्ञात नियमों का ध्‍यान रखा जाए और यदि लेखक वर्तमान ज्ञात नियमों से इतर भी कोई परिकल्‍पना प्रस्‍तुत कर रहा हो, तो उसके पास उसका पर्याप्‍त वैज्ञानिक आधार होना चाहिए।

किन्‍तु दुर्भाग्‍य का विषय यह है कि हिन्‍दी में अभी तक विज्ञान कथाओं को लेकर बहुत ज्‍यादा भ्रम है। विज्ञान कथा लेखकों की एक बड़ी संख्‍या अभी भी ऐसी है, जो विज्ञान के उपकरणों, वैज्ञानिक यानों अथवा दूसरे ग्रह से आए प्राणियों को लेकर रची गयी कहानियों को ही विज्ञान कथा समझते हैं। इसके साथ ही साथ हिन्‍दी में कुछ ऐसे भी रचनाकार हैं जो कोयले की कहानी, बिजली की कहानी जैसे जानकारीपरक लेखों को ही विज्ञान कथा कहने लगते हैं। जाहिर सी बात है कि ऐसा अज्ञानतावश ही होता है। इसके लिए जहाँ नवोदित रचनाकर अध्‍ययन से दूर रहने के दोषी हैं, वहीं विज्ञान कथाओं से सम्बंधित आलोचनात्‍मक साहित्‍य का उपस्थित न होना भी इसकी एक प्रमुख वजह है। 

विज्ञान कथा की परम्‍परा:
यूँ तो कुछ लोग विज्ञान कथा की शुरूआत सन 1488 से मानते हैं, जब विश्‍व प्रसिद्ध चित्रकार लियोनार्दो द विन्‍सी ने फ्लाइंग  मशीन की कल्‍पना की थी। लेकिन हकीकत में वह सिर्फ एक मशीन की कल्‍पना भर थी, जबकि विज्ञान कथा के लिए कथा तत्‍व की भी आवश्‍यकता हुआ करती है। इस नजरिए से पहली विज्ञान कथा लिखने का श्रेय अंग्रेजी के महान कवि पी0बी0 शैली की पत्‍नी मेरी शैली को जाता है। उन्‍होंने 21 वर्ष की अवस्‍था में फ्रेंकेंस्‍टीन नामक उपन्‍यास लिखा, जो 1818 में प्रकाशित हुआ। इसे ही विश्‍व की पहली विज्ञान कथा का दर्जा प्राप्‍त है।

मेरी शैली के बाद अगर किसी ने विज्ञान कथा के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्य किया, तो वे थे फ्रेन्‍च लेखक जूल्‍स वर्न। उनका पहला उपन्‍यास फाइव वीक्‍स इन ए बैलून 1863 में प्रकाशित हुआ। उसके बाद उन्‍होंने ए जर्नी टू द सेन्‍टर ऑफ अर्थ, फ्रॉम द अर्थ टू द मून, एराउंड द मून, एराउंड द वर्ड इन 80 डेज, आदि 5 दर्जन से अधिक वैज्ञानिक उपन्‍यासों की रचना की, जिनकी साहित्यिक जगत में धूम रही।
जूल्‍स वर्न ने जहाँ अपने वैज्ञानिक उपन्‍यासों के द्वारा साहित्यिक जगत में हलचल मचाई, वहीं  एच0जी0 वेल्‍स ने अपने वैज्ञानिक उपन्‍यासों के द्वारा विज्ञान कथा को एक साहित्यिक विधा के रूप में स्‍पष्‍ट पहचान दिलाई। उनका सबसे पहला उपन्‍यास द टाइम मशीन 1895 में प्रकाशित हुआ। उन्‍होंने उसके अतिरिक्‍त द इनविजिबल मैन, द वार ऑफ द वर्ल्‍डस और द फर्स्‍ट मैन इन द मून आदि चर्चित उपन्‍यास लिखे, जो सारे विश्‍व में सराहे गये। जूल्‍स वर्न और एच0जी0 वेल्‍स की रचनाओं ने न सिर्फ लोकप्रियता के नए आयाम स्‍थापित किये, वरन सम्‍पूर्ण विश्‍व में विज्ञान कथाओं की अलख भी जगाई। जाहिर सी बात है कि इसका असर हिन्‍दुस्‍तानी लेखकों पर भी पड़ना ही था।

हिन्‍दी में पहली विज्ञान कथा लिखने वालों में अम्बि‍का दत्‍त व्‍यास का नाम आता है, जिन्‍होंने जूल्‍स वर्न के लोकप्रिय उपन्‍यास ए जर्नी टू द सेन्‍टर ऑफ अर्थ से प्रेरित होकर आश्‍चर्य वृत्‍तांत नामक उपन्‍यास लिखा। यह उपन्‍यास पीयूष प्रवाह नामक पत्रिका में 1884-88 के मध्‍य प्रकाशित हुआ। इसके काफी समय बाद सरस्‍वती के जून 1900 में प्रकाशित भाग-1, संख्‍या-6 में केशव प्रसाद सिंह की विज्ञान कथा चंद्रलोक की यात्रा प्रकाशित हुई। लेकिन इस पर भी जूल्‍स वर्न के उपन्‍यास फ्रॉम द अर्थ टू द मून की छाया स्‍पष्‍ट रूप से दखी जा सकती है। इसलिए इन दोनों रचनाओं को हिन्‍दी की पहली मौलिक विज्ञान कथा का दर्जा नहीं दिया जा सकता। ऐसे में इस पद की हकदार बनती है सत्‍यदेव परिव्राजक की कहानी आश्‍चर्यजनक घण्‍टी, जोकि सन 1908 में सरस्‍वती में प्रकाशित हुई थी। यह कहानी ध्‍वनि अनुनाद पर आधारित है और विज्ञान कथा के समस्‍त मानदण्‍डों पर खरी उतरती है।

सत्‍यदेव परिव्राजक के बाद विज्ञान कथा के क्षेत्र में छिटपुट प्रयास हुए, जिनमें 1915 में प्रकाशित प्रेम वल्‍लभ जोशी की कहानी छाया पुरूष तथा अनादिधन बंद्योपाध्‍याय की रचना मंगल यात्रा के नाम शामिल हैं। लेकिन इस दिशा में पहली बार अगर किसी ने गम्भीर कार्य किया, तो वह नाम है दुर्गा प्रसाद खत्री। चंद्रकाँता के लिए जगविख्‍यात देवकी नंदन खत्री की सुपुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री ने न सिर्फ अपने पिता के भूतनाथ एवं रोहतास मठ उपन्‍यासों को संपूरित किया, वरन उन्‍होंने सुवर्ण रेखा, स्‍वर्गपुरी, सागर सम्राट और साकेत जैसे वैज्ञानिक उपन्‍यास भी लिखे।

हिन्‍दी विज्ञान कथाओं के क्षेत्र में राहुल सांकृत्‍यायन द्वारा रचित बाइसवीं सदी का भी महत्‍वूपर्ण स्‍थान है, जिसमें उन्‍होंने आने वाले भविष्‍य की वैज्ञानिक कल्‍पना की है। राहुल सांकृत्‍यायन के बाद इस क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्य करने वालों में डॉ0 ब्रहमोहन गुप्‍त (दीवार कब गिरेगी), यमुना दत्‍त वैष्‍णव अशोक (अस्थिपंजर, शैलगाथा, श्रेष्‍ठ वैज्ञानिक कहानियाँ, पुरस्‍कृत विज्ञान कथा साहित्‍य आदि), डॉ0 सम्‍पूर्णानंद (पृथ्‍वी के सप्‍तर्षि मण्‍डल), डॉ0 नवल बिहारी मिश्र (अधूरा आविष्‍कार एवं सत्‍य और मिथ्‍या) आदि के नाम प्रमुख हैं। यमुना दत्‍त वैष्‍णव अशोक ने जहाँ अपनी मौलिक विज्ञान कथाओं के द्वारा विज्ञान कथा साहित्‍य के भण्‍डार को भरा, वहीं नवल बिहारी मिश्र ने अंग्रेजी सहित्‍य की विज्ञान कथाओं का हिन्‍दी अनुवाद करके उसे समृद्ध बनाया।
इसके बाद हिन्‍दी में विज्ञान कथाकारों की एक लम्‍बी परम्‍परा दिखाई पड़ती है, जिनमें डॉ0 ओमप्रकाश शर्मा (महामानव की मंगल यात्रा, जीवन और मानव, गाँधी युग पुराण एवं युगमानव), आचार्य चतुरसेन शास्‍त्री (खग्रास), सत्‍य प्रभाकर (पराजय), रमेश वर्मा (सिंदूरी ग्रह की यात्रा, अंतरिक्ष स्‍पर्श, अंतरिक्ष के कीड़े), रमेश दत्‍त शर्मा (प्रयोगशाली प्राण, हरा मानव, हंसोड़ जीन), कैलाश शाह (मृत्‍युंजयी, असफल विश्‍वामित्र, मशीनों का मसीहा), माया प्रसाद त्रिपाठी (आकाश की जोड़ी एवं साढ़े सात फुट की तीन औरतें), राजेश्‍वर गंगवार (शीशियों में बंद दिमाग, साढ़े सैंतीस वर्ष), प्रेमानंद चंदोला (खामोश आहट, चीखती टप-टप) के नाम मुख्‍य रूप से लिये जा सकते हैं।

हिन्‍दी विज्ञान कथाएँ यूँ तो समय समय पर सरस्‍वती, साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान और धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, लेकिन अगर किसी पत्रिका ने इनके प्रकाशन को सबसे ज्‍यादा प्रोत्‍साहन दिया है, तो उसमें विज्ञान (इलाहाबाद) एवं विज्ञान प्रगति का प्रमुख योगदान रहा है। इसके अतिरिक्‍त गत 09 वर्षों से निरंतर प्रकाशित हो रही विज्ञान कथा (त्रै0) पत्रिका भी विज्ञान कथा की मशाल को लगातार जलाए रखे हुए है। इन तमाम प्रयासों के कारण वर्तमान में हिन्‍दी विज्ञान कथाकारों की एक बड़ी जमात सक्रिय नजर आती है। इन रचनाकारों में शुकदेव प्रसाद (हिमीभूत और अन्‍य विज्ञान कथाएँ, भारतीय विज्ञान कथाएँ), डॉ0 अरविंद मिश्र (एक और क्रौंच वध), देवेन्‍द्र मेवाड़ी (भविष्‍य, कोख), राजीव रंजन उपाध्‍याय (आधुनिक ययाति, सूर्य ग्रहण), ज़ाकिर अली रजनीश (गिनीपिग, विज्ञान कथाएँ), हरीश गोयल (तीसरी आँख, आपरेशन पुनर्जन्‍म), जीशान हैदर जैदी (प्रोफेसर मंकी, ताबूत), मनीष मोहन गोरे (325 साल का आदमी), विष्‍णु प्रसाद चतुर्वेदी (अंतरिक्ष के लुटेरे), कल्‍पना कुलश्रेष्‍ठ (उस सदी की बात), अमित कुमार (प्रतिद्वन्‍द्वी), इरफान ह्यूमन आदि के नाम मुख्‍य रूप से लिये जा सकते हैं।

विज्ञान कथाओं की सीमाएँ:
प्राचीन भारतीय काल में जहाँ आर्यभट एवं भास्‍कराचार्य जैसे वैज्ञानिकों ने अपनी स्‍थापनाओं एवं ज्ञान को अभिव्‍यक्‍त करने के लिए लोकभाषा की उपेक्षा करके संस्‍कृत का इस्‍तेमाल किया था, वहीं आज के वैज्ञानिक भी शोध सम्‍बंधी कार्य व्‍यवहार के लिए अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्‍त वे अपनी बात को कहने के लिए तमाम प्रकार के चिन्‍हों और संकेतों का भी प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि भारतीय समाज में विज्ञान प्रारम्‍भ से ही एक दुरूह विषय माना जाता रहा है। ऐसे में विज्ञान से जुड़ी बातों को लोक भाषा में आमजन तक पहुँचाने में बड़ी बाधाएँ आती है। इस बाधा से निपटने के दो प्रमुख रास्‍ते हो सकते हैं। पहला यह कि खोज कार्यों से जुड़े हुए वैज्ञानिक अपने शोधकार्यों को सरल भाषा में आम जन तक ले जाएँ, जिससे जनमानस उनसे भलीभाँति परिचित हो सके। दूसरा यह कि विज्ञान की पृष्‍ठभूमि वाले लेखक आगे आएँ और इस कार्य को निभाने की जिम्‍मेदारी संभालें। लेकिन इसमें भी खतरा यह रहता है कि विज्ञान के कठिन सूत्रों को सरल करने के चक्‍कर में वह गलत तरीके से व्‍याख्‍यायित न हो जाएँ। यही कारण है कि विज्ञान लेखन एक कठिन एवं जिम्‍मेदारी वाले कार्य के रूप में जाना जाता है।
चूँकि विज्ञान कथा में भी विज्ञान तत्‍व की अनिवार्यता होती है, इसलिए चाहते हुए भी कला वर्ग से जुड़े रचनाकार इस क्षेत्र में हाथ-पैर मारने से कतराते हैं। दूसरी बात यह है कि विज्ञान कथा लिखने के लिए विज्ञान के साथ-साथ कथा तत्‍व की भी आवश्‍यकता पड़ती है; इसलिए जो विज्ञान लेखन में रूचि रखने वाले लोग हैं, वे कथा में कमजोर पड़ जाने के कारण पीछे रह जाते हैं। ऐसे रचनाकारों द्वारा प्रणीत रचनाएँ आमतौर से रोचकता के लिहाज से बेहद कमजोर रह जाती हैं, जिससे उन्‍हें आलोचना का सामना करना पड़ता है।

इन हालातों में ज्‍यादा उम्‍मीद उन्‍हीं रचनाकारों से बंधती है, जो कथा प्रणयन में माहिर होते हैं और विज्ञान की पृष्‍ठभूमि से जुड़े होते हैं। चूँकि विज्ञान में असीम ब्रह्माण की संभावनाएँ निहित होती हैं, इसलिए आमतौर से कला वर्ग की पृष्‍ठभूमि वाले रचनाकार अक्‍सर इसकी ओर आकर्षित तो होते हैं, लेकिन व्‍यापक अध्‍ययन के अभाव में या तो अपनी रचनाओं में कोई गम्‍भीर वैज्ञानिक त्रुटि वर्णित कर जाते हैं या फिर जानबूझकर विज्ञान को अपने मनचाहे स्‍वरूप में तोड़-मरोड़ कर प्रस्‍तुत करने लगते हैं। इसकी वजह से उन्‍हें आगे चलकर आलोचना का सामना करना पड़ता है और नतीजतन वे उससे तौबा कर लेने में ही अपनी भलाई समझते हैं।

विज्ञान कथा के पिछले सौ सालों के इतिहास पर नजर डालने पर यह स्‍पष्‍ट रूप से दृष्टिगोचर होता है कि इससे जुड़े हुए लेखक मूल रूप से विज्ञान की पृष्‍ठभूमि से जुड़े रहे हैं। लेकिन आमतौर पर ऐसे रचनाकार साहित्‍य से उतना जुड़ाव नहीं रखने के कारण न तो साहित्‍य की बुनियादी प्रवृत्तियों को समझ पाते हैं और न ही उसकी जिम्‍मेदारियों को। यही कारण है कि अधिसंख्‍य रचनाकार अपनी रचनाओं को एक रहस्‍य और रोमांच कथा से आगे ले जाने में समर्थ नहीं हो पाते।

इन सबके साथ ही साथ एक कटु सत्‍य यह भी है कि हिन्‍दी में विज्ञान कथा आज तक अपनी एक सर्वसम्‍मत परिभाषा निर्धारित नहीं कर सकी है। एक ओर जहाँ विज्ञान कथाकारों का एक धड़ा विज्ञान कथा को भविष्‍य की कहानी के रूप में प्रचारित करता है और अपनी रचनाओं को वैज्ञानिकों के लिए प्रेरक के रूप में स्‍थापित करने हेतु प्रयत्‍नशील दिखता है, वहीं दूसरा समूह इसकी खिल्‍ली उड़ाता हुआ नजर आता है और रचनाओं में आवश्‍यक रूप से वैज्ञानिक सिद्धाँतों की पड़ताल के बहाने लेखकों की खिल्‍ली उड़ाता पाया जाता है। इसका दुष्‍प्रभाव यह होता है कि नवोदित रचनाकार इसे लेकर भ्रम का शिकार हो जाते हैं और अपने लिखे हर गलत-सही को ब्रह्मा की लकीर मानने लगते हैं।

जाहिर सी बात है कि विज्ञान कथा ने भले ही अपने 100 साल का सफर तय कर लिया हो, उसके सामने चुनौतियाँ अब भी वैसी ही हैं, जैसी 100 साल पहले थीं। यदि विज्ञान कथाकार सचमुच में विज्ञान कथा को साहित्‍य जगत में सम्‍मानपूर्ण स्‍थान दिलाना चाहते हैं, तो उन्‍हें उपरोक्‍त परस्थितियों पर न सिर्फ गम्‍भीरतापूर्वक विचार करना होगा, वरन अपने भेदभाव भूलकर इनसे पार पाने का रास्‍ता भी खोजना होगा। अन्‍यथा यह सवाल ज्‍यों का त्‍यों बना रहेगा कि विज्ञान कथाएँ भविष्‍य की कथाएँ हैं या फिर हिन्‍दी में विज्ञान कथाओं का भविष्‍य कैसा है?
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