लोड हो रहा है...

वर्ष 2009 हेतु सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर सम्मान- अनुशंसाएँ एवं सुझाव आमंत्रित हैं।

ब्लॉग जगत में पिछले कुछ समय से इतनी उठा पटक और गाली-गलौज का दौर चल रहा है, जिसे देखकर कभी-कभी लगता है कि हम क्यों‍कर इस क्षेत्र में आए। ऐसे में वे लोग, जो इस क्षेत्र में गम्भीरता से जुड़े हुए हैं, और पूरी निष्ठा के साथ कार्य रहे हैं, कभी-कभी निराश से हो जाते हैं। यही कारण है कि अक्सर सुनने में भी आता रहता है कि कल फलां ब्लॉगर ने अलविदा कहा और आज फलाँ ने। ऐसे समय में हम बस निरूपाय खडे़ से रह जाते हैं। हम ब्लॉग जगत की बेहतरी के लिए कुछ करना चाहते हैं, पर हमारे हाथ में कुछ होता ही नहीं। लिहाजा हम बस तमाशाई बने रहते हैं।

ऐसे ही किसी क्षण में मेरे मन में यह ख्याल आया कि अगर हम बुरी प्रवृत्तियों को मिटा नहीं सकते हैं, तो अच्छे विचारों और अच्छे लोगों के प्रोत्साहन के लिए तो कुछ कर सकते हैं। इसी विचार के फलस्वरूप सोचा कि ब्लॉग जगत में जो लोग कुछ अच्छा और सार्थक कर रहे हैं, क्यों न उन्हें प्रोत्साहित किया जाए एक छोटा सा सम्मानचिन्ह देकर। इसी सोच को विस्तार देते हुए मैंने अलग अलग विधाओं के ब्लॉग लेखकों को 'श्रेष्ठ चिट्ठाकार' सम्मान देने की योजना बनाई है।

फिलहाल इस सम्मान के अन्तर्गत चुने गये ब्लॉगर को एक वर्चुअल प्रमाण पत्र देने की योजना है। यदि आप सबका सुझाव होगा, तो इसे मुद्रित कराकर भी दिया जा सकता है। यह सम्मान "संवाद डॉट कॉम' की ओर से दिया जाएगा। यदि भविष्य में कुछ फण्ड की व्यवस्था हो सके, या कोई भामाशाह मिल जाए, तो इस हेतु एक सम्मान राशि (फिलहाल रचना जी ने पुस्तकों का प्रस्ताव दिया है) का भी प्राविधान किया जा सकता है।

उक्त सम्मान के निर्धारण हेतु फिलहाल ब्लॉग जगत में सक्रिय 25 समर्पित ब्लॉगर्स से नामांकन मांगे गये हैं। (गोपनीयता की दृष्टि से उनके नाम यहाँ नहीं खोले जा रहे हैं।) उन लोगों से एक सप्ताह में सभी श्रेणियों के लिए नामांकन देने का आग्रह किया गया है, जिसे ज्यादातर लोगों ने सराहा है। नामित व्यक्ति को प्रत्येक श्रेणी के लिए ब्लॉगर का नाम एवं उसके ब्लॉग का यू0आर0एल0 सुझाना है। नियम एवं शर्तें सिर्फ इतनी हैं कि किसी भी श्रेणी के लिए वे स्वयं को नामित नहीं कर सकते। फिलहाल सम्मान हेतु भेजी गयी श्रेणियाँ निम्नवत हैं-

1- सामाजिक लेख
2- व्यंग्य लेख
3- संस्मरण
4- यात्रा वृत्तांत
5- चिट्ठा चर्चा
6- नारी सशक्तिकरण
7- अपनी कविताओं का काव्य पाठ
8- कहानी
9- हिन्दी कविता/गीत
10- हिन्दी ग़ज़ल
11- उर्दू ग़ज़ल/नज्म
12- कार्टून
13- नवोदित ब्लॉगर
14- वैज्ञानिक दृष्टिकोण
15- साहित्य सेवा
16- तकनीकी मददगार
17- सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर
18- ब्लॉग संरक्षक

कुछ लोगों का सुझाव है कि इन सम्मानों को ज्यादा विश्वनीयता दिलाने के लिए अलग से भी ऑनलाइन वोटिंग कराया जाना चाहिए तथा कुछ लोगों का सुझाव है कि इसके लिए मेल से भी लोगों से नॉमिनेशन मांगे जाने चाहिए।

इस सम्बंध में आप सबका क्या मत है, कृपया बताने का कष्ट करें, जिसे इस प्रक्रिया को पारदर्शी एवं विवादरहित बनाया जा सके। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि स्वस्थ ब्लॉगिंग को प्रोत्साहित करने के लिए आप अपने कीमती समय में से थोड़ा सा वक्त निकाल कर हमारा मार्गदर्शन अवश्य करेंगे। इस हेतु हम आपके हृदय से आभारी होंगे।
-------------------
हमारा प्रयास है कि इन सम्मानों को यादगार बनाया जाए। इसके लिए प्रायोजकों की तलाश है। फिलहाल सम्मानों की अलग-अलग श्रेणी के प्रायोजक के रूप में श्री महफूज अली और श्री सलीम खान ने रूचि दिखाई है।  हमारी यह योजना है कि प्रायोजकों का नाम, उनका फोटो और उनके ब्लॉग/साइट का लिंक सम्मान पत्र में दिया जाए। यदि अन्य व्यक्ति/संस्था भी इस हेतु इच्छुक हों, तो कृपया (ईमेल-zakirlko@gmail.com और मोबाईल-9935923334 पर) सम्पर्क करें।

एक छोटी सी गल्ती, जो बड़े-बड़े ब्लॉगर करते हैं।

हर आदमी के जीवन में अनजाने में कोई न कोई ऐसी गल्ती कभी न कभी हो ही जाती है, जिसके लिए हमें उम्र भर पछताना होता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ऐसी ही एक छोटी सी गल्ती आमतौर से ज्यादातर ब्लॉगर भी करते हैं। वे उसे देखकर मन ही मन कुढ़ते रहते हैं, पर उसका कोई हल नहीं मालूम होने के कारण मन मार कर रह जाते हैं।

यहाँ पर उन ब्लॉगर्स की बात कर रहा हूँ, जो अपना मैटर एम0एस0 आफिस में टाइप करते हैं और उसमें सेव करते हैं। आमतौर पर यह देखने में आता है कि एम0एस0 आफिस  से कोई भी मैटर जब लेकर हम ब्लॉगर में पेस्ट करते हैं, तो उसमें लाइन अलाइनमेंट गड़बड़ हो जाता है। कभी कभी एक पैरे का फांट छोटा हो जाता है और दूसरे का बड़ा। तो कभी दो पैरों के बीच डबल गैप हो जाता है और कभी कभी चाह कर भी हम दो पैरों के बीच में गैप नहीं दे पाते हैं। अगर आपके साथ भी ऐसी ही समस्या है, तो फिर ये पोस्ट आपके लिए ही है।

पहले मुझे भी अक्सर यही समस्या होती थी। एक दिन ब्लॉगर विनय भाई मुझसे मिलने आए हुए थे। उन्होंने जब इस समस्या से जुझते हुए मुझे देखा, तो झट से उसका एक आसान सा सल्यूशन बता दिया। यह बात तो काफी पुरानी हो चुकी है। लेकन कल जब मैं 'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन' पर पूनम मिश्रा जी का आलेख 'धरती का हर बाशिन्दा महफ़ूज़ रहे, खुशहाल रहे' प्रकाशित कर रहा था, तो मुझे फिर उसी दिक्कत का सामना करना पड़ा। इसलिए मैं सोचा कि क्यों न यह छोटी सी जानकारी मैं आपके साथ शेयर करूँ।

जब भी आप कोई यूनिकोड मैटर वर्ड से  लेजाकर ब्लॉगर में पेस्ट करें, तो उसे कॉपी करके नोट पैड  (*.txt)  फाइल बनाकर उसमें पेस्ट कर दें। इस फाइल को सेव ऐज़ कर लें। हाँ, सेव ऐज़ करते समय फाइल की इनकोडिंग को यू0टी0एफ0 में परिवर्तित करना न भूलें। इसके बाद आप फिर से वर्ड में आएं और कोई अन्य मैटर कॉपी कर लें, जिससे कम्प्यूटर की मेमोरी में पड़ा पहले वाले मैटर का एलाइनमेंट हट जाएगा। अब आप टेक्स्ट फाइल के मैटर को उठाएं और ब्लॉगर में मनचाही जगह पेस्ट कर दें और मैटर में मनचाही सेटिंग दे दें।

तो देखा, है न कितना आसान तरीका। वैसे आपके लिए अच्छा यही होगा कि आप अपने यूनिकोड डॉक्यूमेंट को टेक्स्ट फाइल में ही सेव करें, तो ज्यादा अच्छा है। क्योंकि यह वर्ड के मुकाबले कम जगह भी घेरता है और कोई ऐसी बैकग्राउंड सेटिंग भी नहीं बनाता, जो आपको ब्लॉगर में दिक्कत करे।

आप मानें या न मानें, सलीम खान का हृदय परिवर्तन हो चुका है।

जी हाँ, ये किसी और की नहीं ‘स्वच्छ संदेश-हिन्दुस्तान की आवाज़’ वाले सलीम खान की ही बात हो रही है। पिछले दिनों उनको लेकर बहुत कुछ लिखा गया है, उस लिखे में कितनी हकीकत थी और कितना फ़साना, यह आप सबको पता चल चुका है। पर इस सम्पूर्ण प्रकरण ने सलीम खान को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है और उन्होंने अपने आप को बदलने का फैसला ले लिया है।

अब आप पूछेंगे कि इस घटना से मेरा क्या सम्बंध? मैं क्यों सलीम खान की वकालत कर रहा हूँ? तो रूकिए जनाब, बताता हूँ, सब बताता हूँ।

लेकिन इस बात को बताने से पहले इसकी भूमिका बताना मैं आपको जरूरी समझता हूँ। क्योंकि इसके बिना न तो आप पूरी बात समझ पाएंगे और न ही इसका मंतव्य।

सलीम खान हमारे शहर लखनऊ के रहने वाले हैं और वे निहायत ईमानदार, मेहनती और कर्तव्यपरायण व्यक्ति हैं। ये बातें मुझे परसों उनसे मिलकर पता चलीं। दिनांक 09 दिसम्बर को टेलीफोन पर सलीम का जब अचानक फोन आया, तो मुझे उनसे मिलने की इच्छा जागृत हो उठी। हालाँकि सलीम खान से मेरी पुस्तक 'हिन्दी में पटकथा लेखन' के विमोचन के दौरान हुई क्षणिक भेंट के बाद मैं मिलना चाहता था, पर व्यस्तता के कारण यह सम्भव नहीं हो रहा था। पर महफूज़ भाई वाले कांड ने इस मुलाकात को अवश्यम्भावी बना दिया।

शाम को पांच तीस के करीब हजरतगंज स्थित हिन्दी संस्थान के गेट पर मुलाकात हुई। उसके बाद हम लोग एक छोटे से होटल पर बैठे और चाय समोसे के आर्डर के बाद एक दूसरे से रूबरू हुए। ज़ाहिर सी बात है कि बातों की शुरूआत स्वच्छ हिंदुस्तान वर्सेस उम्दा सोच ही रही, लेकिन जैसे जैसे यह सिलसिला आगे बढ़ता गया, मेरे सामने सलीम खान का एक अनूठा व्यक्तित्व सामने आता गया। और वह था परिस्थितियों से घिरा हुआ एक अदद पुतला। परिस्थितियाँ कितनी जालिम होती हैं, किस तरह से व्यक्ति को मजबूर कर देती हैं, यदि यह आपको देखना हो, तो भगवती चरण वर्मा का कालजयी उपन्यास ‘चित्रलेखा’ देखा जा सकता है।

उन बातों को सुनकर मैं एकदम हतप्रभ रह गया। किस प्रकार लोग अपने छोटे से लाभ के लिए दूसरों को बलि का बकरा बना देते हैं, इसका जीता जागता उदाहरण सलीम खान हैं।

दो घन्टे चली इस बातचीत के बाद जैसा मैं सोच रहा था, वैसा ही हुआ। हाँ, चाहे आप मानें या न मानें मेरी दलीलों, आग्रहों और सुझावों ने सलीम खान का हृदय परिवर्तन कर दिया था। उन्होंने मुझसे वादा किया कि वे अपनी पुरानी जिंदगी के ढ़र्रे को बदलते हुए अपनी लेखन शैली को बदल देंगे और भविष्य में सिर्फ विज्ञान संचार सम्बंधी विषयों पर ही अपनी कलम चलाएँगे।

सलीम खान के इस आश्वासन के बाद मैंने ‘साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन’ में योगदान के लिए उन्हें आमंत्रित कर लिया है। हमारी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वे सलीम खान की पुरानी छवि से बाहर निकलने में मदद करेंगे। और साथ ही साथ तमाम ब्लॉगर साथियों से भी आग्रह है कि वे भविष्य में सलीम खान को छेड़ने वाले आलेख नहीं लिखेंगे। क्योंकि ये सबको पता है कि पुराने ज़ख्मों को हरा होने में और सोए हुए शेर को भड़कने में देर नहीं लगती।

एक ब्लॉगर की शादी की पार्टी, जिसमें दूल्हा आमंत्रित नहीं था (शीर्षक का कॉपीराइट-सुश्री मीनू खरे)

(सारे बंधन, सारे लिहाज के परे रही लखनऊ की पहली नॉन ऑफीशियल ब्लॉगर्स मीट)


 (From right to left: Dr. Arvind Mishra, Girijesh Rao, Mahfooz Ali, Zakir Ali, Om, Zeashan Zaidi & Vinay Prajapati)
कल का दिल लखनऊ के ब्लॉगर्स के लिए खास रहा, क्योंकि लखनऊ के कुछ चुनिंदा ब्लॉगर्स हजरतगंज के कॉफी हाउस में अरविंद मिश्र जी के सम्मान में जमा हुए और खूब हो हल्ला किया। इस छोटी सी पार्टी में अमित ओम की शादी को पकौड़े, पेस्ट्री और कॉफी से सेलेब्रेट किया गया, जिसमें मीनू खरे जी की सलाह के अनुसार ओम को आमंत्रित नहीं किया गया था। लेकिन ओम भाई अपनी लेट लतीफी वाली इमेज को तोड़ते हुए बिना बुलाए तय समय से 15 मिनट पहले ही पहुंच गये।

लगभग तीन घन्टे चली इस ब्लॉगर मीट में डा0 अरविंद मिश्र  के अतिरिक्त गिरिजेश राव,  जीशान हैदर जैदी,  महफूज़ अली, विनय नज़र  और ओम के साथ मुझ नाचीज़ ने भी शिरकत की।

चर्चा की शुरूआत ब्लॉगर के प्रिय टॉपिक कमेंट से हुई, जिसमें महफूज भाई ने 100-100 कमेंट पाने के राज़ बताए। इस अवसर पर अरविंद जी ने एक बहुत ही मार्के की बात कही- कोई भी व्यक्ति अपना पहला प्यार और पहला कमेंट कभी नहीं भूलता।

इसका निशाना मेरी ओर था, क्योंकि महफूज़ भाई बता रहे थे कि वे आजकल नारी ब्लॉगर्स से बहुत परेशान हैं। इसपर किसी ने चुटकी ली कि नारी ब्लॉगर्स से परेशान हैं या फिर नारी ब्लॉगर्स इनसे परेशान हैं? तभी उसी समय विनय भाई के मोबाइल पर एक ब्लॉगर का फोन आ धमका। किसी ने पूछा किसका फोन है? जवाब मैंने दिया- अरे, ये वही ब्लॉगर हैं, जो सिर्फ नारी ब्लॉग पर कमेंट करते पाए जाते हैं। इसपर सभी लोगों ने एक जोरदार ठहाका लिया और लगे हाथ उन सभी महारथियों के नाम गिना डाले गये, जो 99 प्रतिशत नारियों के ब्लॉग पर ही विचरण करते पाए जाते हैं।

चर्चा जब कमेंट की चल रही हो, तो फिर कमेंट की प्रकृति पर कैसे न जाती? लिहाजा सूई घूमी और नाइस पर जा कर अटक गयी। ऐसे में उन सभी ब्लॉगर का प्रशस्ति गायन तो होना ही था, जो अपने अधिकतर कमेंट में नाइस का प्रयोग करके काम चला लेते हैं। तभी अरविंद जी को अचानक कुछ याद आया और वो बोले- एक जगह ज्ञान जी भी कहीं नाइस कहते हुए पाए गये थे।

बातचीत का अगला विषय रहा सबसे ज्यादा पढी जाने वाली पोस्ट। जिसके क्रम में मैंने जैसे जी तस्लीम की प्रेमी प्रेमिका वशीकरण मंत्र का जिक्र छेड़ा, गिरिजेश जी अपनी 'चूमा चाटी' और कोकशास्त्र वाली पोस्ट की मीठी यादें लेकर बैठ गये। उसी समय ओम भाई ने इलाहाबाद में इरफान भाई द्वारा बतायी गयी उनकी गंदी लड़की का भी चर्चा छेड़ दिया। सभी लोग इस सब का मजा ले ही रहे थे कि महफूज भाई ने अपनी एक सत्यकथा से हम सबको लाभान्वित किया, जिसमें किसी ब्लॉगर ने उन्हें जिगोलो समझ कर काफी दिनों तक यूज़ किया था। उस समय महफूज़ भाई के चेहरे की लाली बता रही थी कि उनकी जबान से निकला एक-एक लफ़ज सच है और साथ ही यह भी सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस प्रकरण के बंद जाने पर उन्हें काफी दुख भी हुआ था।

इन तमाम वार्ताओं के दौरान दो लोग जब तब चाहे-अनचाहे कूदते रहे। एक तो सुश्री लवली जी, दूसरे फुरसतिया भाई। फुरसतिया जी इस सेंस में गिरिजेश जी के माध्यम से कूद पड़ रहे थे कि अगर इस गोष्ठी की रपट ज्यों की ज्यों छपी, तो वे अपनी चर्चा में इसकी अच्छी खबर लेंगे। वैसे वहाँ पर इस बात की भी चर्चा हुई कि उननके चिट्ठा चर्चा में अपने ब्लॉग को देखने के लिए उतावले लोग जिस तरह से उनकी तारीफ करते फिरते हैं, उसे वे उसी सहजता से अपनी असली तारीफ समझ लेते हैं। लेकिन इस सम्बंध में किसने क्या कहा, यह बात गोपनीय ही रखी जा रही है।

लवली जी की चर्चा का कारक बना डेजा वू बीच-बीच में सबको परेशान किये रहा। और इसका असली कारण मुझे साईब्लॉग की इस ताजा पोस्ट को पढ़ने के बाद ही समझ में आया। अगर आपकी समझ में न आया हो कि ये डेजा वू कौन सी बला है, तो इसे आप भी पढ ही डालें।

इसके आगे और भी बातें हुई, जैसे कि संसार की सबसे लोकप्रिय पत्रिका प्लेब्वॉय के बारे में। और उस चर्चा में विनय नज़र, अमित ओम, अरविंद मिश्र, गिरिजेश राव ने अपने-अपने अमूल्य अनुभवों से महानुभावों को लाभान्वित किया। अरविंद जी का अपने चाचा की अटैची से प्लेब्वॉय उड़ाना, गिरिजेश जी के प्लेब्वाय के अंकों का उनके भाई के हत्थे लगना, महफूज भाई का किशोरावस्था में दुकान से प्लेब्वॉय चुराना, ओम भाई का यह बताना कि उसके बीच के 4 ग्लेजी पेपर ही मुख्य आकर्षण होते हैं और विनय भाई की यह जानकारी कि वह नेट पर आपको प्लेब्वॉय अवाक्स होम पर फ्री में मिल जाएगी, मैं और जीशान चुपचाप सुनते रहे। इस चर्चा में प्लेब्वाय का जिक्र क्यों आया, यह बताना यहाँ पर बहुत जरूरी है। इसका कारण रहा तस्लीम पर इस बार प्लेब्वॉय के संस्थापक का फोटो लगाकर उसके बारे में पूछा जाना। अब अरविंद जी ने इस महान हस्ती को पहेली के लिए क्यों चुना, यह तो अरविंद जी ही बताएंगे। फिलहाल विनय भाई के सूत्र से हम आपको एक महत्वपूर्ण जानकारी देते चलें कि प्लेब्वॉय भले ही पुरूषों की पत्रिका है, लेकिन उसके पाठकों में 56 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं का होता है।

इस चर्चा को समाप्त करने से पहले दो एक बातें और आपके साथ शेयर करता चलूं। पहला यह कि विनय भाई के पिछले ३ माह से ब्लॉग जगत से कटे रहने का कारण सबने जाना, तो साथ ही महफूज भाई को मीठी सी झिडकी भी मिली कि वे दुनिया जहान में तो टिपियाते फिरते हैं, लेकिन आजतक जीशान भाई के ब्लॉग पर क्यों नहीं गये। और बात जब जीशान भाई की चल रही थी, तो फिर अरविंद जी उनके चिर-काल से चली आ रही प्लैटिनम की खोज पर कमेंट करने से कैसे रह जाते? और नतीजतन जीशान भाई को घोषणा करनी ही पडी़ कि इस माह में उनकी दो सीरीज समाप्त हो रही हैं। पहली साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन की जिसपर है दुनिया को नाज, उसका जन्म दिवस है आज और दूसरी उनके व्यक्तिगत ब्लॉग पर चल रही प्लैटिनम की खोज

इस चर्चा के बीच में पंडित वत्स जी भी मेरे द्वारा कुदा दिये गये। क्योंकि वे उपरोक्त श्रृंखला के प्रारम्भ होने पर अक्सर शिकायत किया करते थे कि इसमें भारतीय वैज्ञानिकों के बारे में नहीं लिखा जाता है। इस पर जीशान भाई ने सुझाव दिया कि क्यों‍ न उन्हें ही यह शुभ कार्य सौंप दिया जाए? तो पंडित जी, अगर आप इस लेख को पढ़ रहे हैं, तो भारतीय वैज्ञानिकों के बारे में लिखने के लिए आप साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन में सादर आमंत्रित हैं।

चलते-चलते चर्चा का एक गंभीर सवाल, जिसे किसी महिला ब्लॉगर ने किसी पुरूष ब्लॉगर से अनायास ही पूछ लिया था। सवाल था कि पुरूष लोग नीली फिल्में क्यों देखते हैं? इसपर उस पुरूष ब्लॉगर ने बहुत ही मासूमियत से जवाब दिया था- जिज्ञासा वश। और इस खराब उत्तर के कारण बेचारे पुरूष ब्लॉगर को एक तगड़ी डांट झेलने पड़ी थी। अब आप खुद अंदाजा लगाइए कि वे दोनों ब्लॉगर कौन हो सकते हैं?

क्षमा प्रार्थना सहित,
जा़किर अली रजनीश

संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य- किसी को भी नहीं मालूम कि सांसद और विधायक किस बात की तनख्वाह लेते हैं।

पिछले दिनों सांसदों द्वारा लोकसभा और राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान प्रश्न पूछने वाले सांसदों के गायब हो जाने से जन सामान्य के बीच यह बहस चल पडी है कि आखिर सांसदों को किस बात की तनख्वाह दी जाती है? और यदि वे अपने काम को ठीक ढ़ग से नहीं कर रहे हैं, तो क्या उनकी तनख्वाह काटी जा सकती है या उन्हें कोई सज़ा दी जा सकती है?

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब न तो किसी प्रदेश की विधानसभा के पास है न ही संसद के पास और न ही लॉ एण्ड जस्टिस विभाग के पास। यानी कि मा0 विधायक और और सांसद किस बात के लिए लाखों रूपये तनख्वाह के रूप में लेते हैं, भारतीय संविधान में इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है।

इस सवाल को सबसे पहले उठाने का श्रेय आर0टाई0आई0 एक्टीविस्ट देवा आशीष भटटाचार्य हो जाता है, जो जनता के बीच उनके अधिकारों के लिए काम करते हैं। उन्होंने देश की सभी विधानसभाओं, संसद और चुनाव आयोग से यह सवाल सूचना के अधिकार के तहत पूछा था लेकिन कोई भी उन्हें इस बात का जवाब नहीं दे सका है।

चुनाव आयोग का इस बारे में कहना है कि लोकसभा की कार्यवाही चलाने वाले नियमों में कहीं भी सांसदों की डयूटी या दायित्वों का उल्लेख नहीं है। न ही यह पता लगाया जा सकता है कि अगर कोई सांसद काम नहीं कर रहा है या गलत ढंग के कर रहा है, तो उसके खिलाफ क्या कार्यवाही की जा सकती है। यही हाल ‍िदल्ली, केरल, मेघायल, अरूणांचल प्रदेश, बिहार, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, गोवा, राजस्थान आदि विधान सभाओं का भी है।

अगर देश की राजधानी दिल्ली का उदाहरण लिया जाए तो एक विधायक को प्रतिमाह लगभग 34 हजार रूपये तनख्वाह के रूप में मिलते हैं, जबकि एक मंत्री का वेतन लगभग 42 हजार रूपये है। ध्यातव्य है कि इस खर्च में कार्यालय, कार, ड्राइवर, सुरक्षा आदि के खर्चे शामिल नहीं हैं। यदि इन सारे खर्चों को भी इसमें जोड़ दिया जाए, तो यह राशि 6 लाख के आसपास जा पहुंचती है। इसी प्रकार सामान्य रूप से एक सांसद पर आमतौर से एक लाख रूपये का खर्च आता है, लेकिन यदि इसमें सांसद से जुड़े अन्य खर्चे भी जोड़ दिये जाएं, तो यह खर्च कई गुना बढ़ जाता है।

इस तरह से देख जाए तो जनता के टैक्स से वसूला गया अरबों रूपया सरकार प्रतिमाह अपने विधायकों, सांसदों और मंत्रियों पर खर्च करती है। लेकिन अगर जनता के चुने हुए ये प्रतिनिधि ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, तो भी न तो सरकार इन खर्चों से किसी तरह की कटौती कर सकती है और न ही उनपर कोई पेनाल्टी लगा सकती है।

इन सारी स्थितियों को देखने के बाद आप या तो खीझ कर अपने सर के बाल नोच सकते हैं या फिर इतना ही कह सकते हैं- इटस हैपेन ओनली इन इंडिया।

इसके अलावा आपके पास कोई विकल्प हो तो हमें ज़रूर बताएँ। इसके लिए हम आपके ह़दय से आभारी होंगे।

ब्लॉगिंग का इतिहास लिखा जाने वाला है -रवि रतलामी।

पिछले कुछ दिनों से ब्लॉगिंग में इतनी गंदगी फैल गयी है कि सांस लेना दूभर हो गया है। जहाँ जाइए, वहाँ लोग एक दूसरे को खुला चैलेंज दे रहे हैं, गालियाँ दे रहे हैं। जितनी तू-तड़ाक संसद में नेताओं के बीच नहीं होती होगी, उतनी जूतमपैजार ब्लॉग जगत में हो रही है। और आश्चर्य होता है कि इस आवेश में बह कर धीर गम्भीर लोग उल्टा-सीधा लिखने से स्वयं को रोक नहीं पा रहे हैं।

एक मछली सारे तालाब को कैसे गन्दा करती है, यह आज हमें समझ में आ रहा है। अगर ये मछलियाँ जाहिल गंवार होतीं तो बात समझ में आती। यहाँ तो मछलियाँ भी इतनी हाई प्रोफाइल हैं कि किसी को समझाने की जुर्रत भी नहीं की जा सकती। आश्चर्य का विषय यह है कि पढ़े-लिखे होने के बावजूद लोगों को यह यह बात क्यों नहीं समझ में आती कि आप दूसरे को नीचा दिखाकर कभी खुद को महान नहीं साबित कर सकते।

इस माहौल को देखकर कई दिनों से मेरा मन खिन्न था। तभी कल मेरी नजर अचानक अपनी पिछली पोस्ट “शोध प्रबंधों तक जा पहुंची है ब्लॉगर्स की धमक” की टिप्पणियों पर जा पड़ी। वहाँ पर रवि रतलामी जी का कमेंट देखकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई। उन्होंने उस कमेंट के द्वारा यह सूचना दी है “हाल ही में एक छात्रा का उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय से हिन्दी ब्लॉगिंग पर पीएच.डी. हेतु पंजीयन हुआ है.”

किसी और के लिए यह ख़बर महत्वपूर्ण हो न हो, पर मेरे लिए यह समाचार बहुत मायने रखता है। इसके मायने यह हैं कि जो कुछ आप ब्लॉग पर लिख रहे हैं, अब वह बेकार नहीं रहा। उसे नोटिस लिया जा रहा है। आज नहीं तो कल वह इतिहास का हिस्सा बनने वाला है।

तो भाइयो, (भाइयों को इसलिए सम्बोधित कर रहा हूँ क्योंकि ज्यादा गड़बड़ी वही लोग कर रहे हैं। आशा है बहनें इसका बुरा भी नहीं मानेंगी?) अब भी समय है। आप स्वयं सोच लो और यह तय कर लो कि इतिहास आप को किस रूप में याद रखे?

गूगल की बेवफ़ाई की कोई तो वजह होगी?

रवि रतलामी जी, आशीष खण्डेलवाल जी, पाबला जी, नवीन प्रकाश जी और अन्य तकनीकी विशेषज्ञ कृपया मदद करें।

इस बेवफाई की शुरूआत अगस्त माह में हुई, जब मैंने अपने ब्लॉग के लिए samwaad.com डोमेन खरीदा और फिर अपने सभी ब्लॉगों को अलग-अलग सी नेम बनाकर उन्हें samwaad.com से जोड़ दिया, जो परिवर्तित होकर निम्नानुसार हो गये-
तस्लीम tsaliim.blogspot.com से ts.samwaad.com
साइंस ब्लॉगर्स असो0 sciblogindia.blogspot.com से  sb.samwaad.com
बालमन baal-man.blogspot.com से  bm.samwaad.com
हमराही hamrahee.blogspot.com से  ts.samwaad.com
मेरी दुनिया.. alizakir.blogspot.com से  za.samwaad.com

मेरे सभी ब्लॉग गूगर सर्च इंजन में प्रमुखता से दिखें, इसके लिए मैंने पहले से ही उनके साइटमैप गूगल के वेबमास्टर टूल के जरिए सब्मिट कर रखे थे। लेकिन डोमिन नेम बदलने के बाद उन्हें फिर से सब्मिट करना जरूरी हो गया था। इसके लिए मैंने पहले उन सभी साइट मैप को डिलीट कर दिया और उसके बाद दूसरी आईडी से यही प्रक्रिया दोहरा दी। लेकिन काफी समय के बाद मुझे यह पता चला कि गूगल सर्च में मेरे ब्लॉग नहीं दिख रहे हैं।

मेरे एक मित्र की सलाह है कि आपने चूंकि दूसरी आई डी से दुबारा साइटमैप सब्मिट किये थे, इसलिए यह हो रहा है। उन्होंने सलाह दी है कि इन साइट मैप को एक बार फिर से डिलीट करके एक सप्ताह के बाद पहली वाली आई डी से सब्मिट कर दें। मैंने उनके बताए सुझाव के अनुसार सभी साइट मैप एक बार फिर से डिलीट कर दिये हैं। लेकिन अभी उन्हें किसी भी आईडी से सब्मिट नहीं किया है। इसकी एक वजह मेरी यह आशंका भी है कि अगर फिर से यह प्रक्रिया सफल नहीं हुई तो मैं क्या करूंगा?

इसलिए आप सबसे मेरा निवेदन है कि कृपया इस मुश्किल को हल करने में मेरी मदद करें और बताएँ कि इस दशा में मुझे क्या करना चाहिए? इस सहयोग के लिए मैं आप सबका हृदय से आभारी होऊंगा।
चलते-चलते एक बात और बताना चाहूँगा कि मैंने इसी प्रकार याहू में भी अपने ब्लॉग के साइटमैप सब्मिट किये थे, जो वहाँ पर ठीक ढ़ंग से काम कर रहे हैं।